विश्वास की दरार और बदलता पड़ोस, क्या 2025 ने हमेशा के लिए बदल दिए भारत-बांग्लादेश के रिश्ते?
News India Live, Digital Desk : दिसंबर 2025 का अंत हो रहा है और जब हम मुड़कर देखते हैं, तो विदेश नीति के मोर्चे पर सबसे ज्यादा चर्चा भारत और उसके सबसे करीबी पड़ोसी बांग्लादेश की होती है। एक समय था जब दोनों देशों के रिश्तों को 'सुनहरा अध्याय' (Golden Chapter) कहा जाता था, लेकिन 2025 ने इस दोस्ती की किताब के पन्ने कुछ इस तरह पलटे कि अब वहां कड़वाहट और खामोशी ज्यादा नजर आती है।
वो दौर जो सब कुछ बदल गया
सच तो ये है कि 2025 की नींव 2024 के अगस्त महीने की उस दोपहर को रखी गई थी, जब ढाका में तख्तापलट हुआ। लेकिन उसका असली 'इम्पैक्ट' 2025 में दिखा। शेख हसीना के भारत आने के बाद बांग्लादेश में जो नई अंतरिम सरकार बनी, उसका मिजाज भारत के प्रति वैसा नहीं रहा जैसा बीते डेढ़ दशक से था। बातचीत की मेज पर गर्मजोशी की जगह अब ठंडे औपचारिक बयानों ने ले ली है।
भावनाओं की लड़ाई और 'इंडिया आउट'
इस साल जो चीज सबसे ज्यादा चुभने वाली रही, वो थी बांग्लादेश की सड़कों पर बढ़ता भारत विरोधी स्वर। सोशल मीडिया पर जिस 'इंडिया आउट' कैंपेन ने जोर पकड़ा, उसने आम भारतीयों के मन में कई सवाल खड़े किए। जिस देश की आज़ादी के लिए भारत ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, वहां भारतीय झंडे और भारतीय सामानों का विरोध देखना वाकई हैरान करने वाला था। इसका असर सीधा व्यापार और आपसी भरोसे पर पड़ा।
अल्पसंख्यकों की चीख और बढ़ता तनाव
साल 2025 में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा का मुद्दा सबसे ज्यादा गरमाया रहा। मंदिरों पर हमले की खबरें और हाल ही में चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी जैसे मामलों ने न सिर्फ भारत सरकार को बल्कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को भी सोचने पर मजबूर किया। भारत में रहने वाले आम लोग भी इस बात से आहत दिखे कि पड़ोस में शांति और सुरक्षा का ढांचा डगमगा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में जब तीखी बहस हुई, तो इसका असर दोनों देशों की सरहद पर तैनात सुरक्षा बलों के तालमेल पर भी दिखा।
इलाज के लिए इंतजार और वीजा की कड़वाहट
राजनीति अपनी जगह है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान हुआ उस आम आदमी का जो हर रोज सरहद के इस पार से उस पार जाता था। 2025 में वीजा नियमों की सख्ती और ढाका में भारतीय उच्चायोग पर हुए विरोध प्रदर्शनों की वजह से उन हजारों बांग्लादेशी मरीजों को मुश्किल हुई जो इलाज के लिए भारत आते थे। भारत के बड़े अस्पतालों में जहाँ कभी बांग्लादेशी चेहरों की भीड़ होती थी, वहां 2025 के अंतिम महीनों में सन्नाटा पसर गया। यह वो इंसानी नुकसान है जिसे कागजों पर नहीं मापा जा सकता।
आगे क्या? क्या उम्मीद की कोई किरण है?
आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां से आगे का रास्ता धुंधला दिखता है। क्या 2026 में हम वापस उस पुरानी दोस्ती को जी पाएंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और भारत के बीच विश्वास की बहाली ही एकमात्र रास्ता है। भारत के लिए सुरक्षा सर्वोपरि है, तो बांग्लादेश के लिए स्थिरता।