लोकसभा में नेहरू पर छिड़ी जंग गौरव गोगोई का पीएम मोदी पर पलटवार, वंदे मातरम पर भी मचा घमासान
News India Live, Digital Desk : अगर आप भारतीय राजनीति में थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं, तो आपको पता होगा कि संसद का सत्र हो और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit Nehru) का नाम न आए, ऐसा कम ही होता है। आज भी लोकसभा में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। लेकिन इस बार बात सिर्फ एकतरफा नहीं रही। जैसे ही पीएम नरेंद्र मोदी ने नेहरू जी का जिक्र किया, कांग्रेस के युवा और तेज-तर्रार सांसद गौरव गोगोई (Gaurav Gogoi) ढाल बनकर खड़े हो गए।
बात कहाँ से शुरू हुई?
संसद में चर्चा चल रही थी और प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में पिछले 70 सालों, संविधान और नेहरू जी की नीतियों का जिक्र करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। अक्सर देखा जाता है कि जब पीएम बोलते हैं, तो विपक्ष बैकफुट पर रहता है, लेकिन असम से आने वाले गौरव गोगोई ने इस बार ईंट का जवाब पत्थर से दिया।
गोगोई ने अपने भाषण में साफ़ कर दिया कि हर बार देश की कमियों के लिए नेहरू जी को जिम्मेदार ठहराना अब पुराना फॉर्मूला हो गया है। उनका अंदाज यह बताने के लिए काफी था कि कांग्रेस अब अपने नेताओं के बचाव में आक्रामक (Aggressive) होकर खेलेगी।
"वंदे मातरम" पर भिड़े पक्ष-विपक्ष
बहस का सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब सत्ता पक्ष (BJP) की तरफ से "वंदे मातरम" के नारे लगने लगे। अक्सर भाजपा इसका इस्तेमाल राष्ट्रवाद दिखाने के लिए करती है। लेकिन गौरव गोगोई ने यहाँ बड़ी होशियारी दिखाई। नारों से डरने या चुप होने के बजाय, उन्होंने इसे अपना लिया।
गोगोई ने साफ़ कहा कि "वंदे मातरम" किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। यह नारा आज़ादी की लड़ाई में नेहरू, गाँधी और कांग्रेस के हर कार्यकर्ता के होंठों पर था। उन्होंने भाजपा सांसदों को याद दिलाया कि राष्ट्रभक्ति के नारे लगाकर आप इतिहास नहीं बदल सकते। गोगोई का कहना था कि हम भी 'वंदे मातरम' कहते हैं, लेकिन हम इसे बांटने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
गौरव गोगोई के तेवर चर्चा में
सदन में गोगोई की बॉडी लैंग्वेज देखने लायक थी। उन्होंने पीएम मोदी की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछे। उनका तर्क था कि आज मणिपुर जल रहा हो या बेरोजगारी की समस्या हो इन सबका जवाब देने के बजाय 1950 या 1960 की बात करना मौजूदा सरकार को शोभा नहीं देता।
जनता क्या सोच रही है?
सोशल मीडिया पर अब इस बहस की क्लिप्स तैर रही हैं। एक तरफ पीएम मोदी के समर्थक हैं जो मानते हैं कि नेहरू की गलतियों का असर आज भी है, वहीं दूसरी तरफ वो लोग हैं जो गोगोई की तारीफ कर रहे हैं कि उन्होंने "नेहरू को विलेन" बनाने की कोशिश का तार्किक जवाब दिया।
संसद की कार्यवाही यह बताती है कि आने वाले दिनों में यह वैचारिक लड़ाई और तीखी होने वाली है। क्या नेहरू का नाम चुनावों में वोट दिला पाएगा या काम की बात होगी? यह तो वक्त ही बताएगा।