पटना की सड़कों पर ट्रैफिक नहीं, अव्यवस्था रेंगती है जानिए अतिक्रमण ने कैसे छीनी आपकी राजधानी की रफ्तार
News India Live, Digital Desk : आज पटना की सड़कों पर चलना किसी जंग से कम नहीं है। आप घर से यह सोचकर निकलते हैं कि 15 मिनट में पहुँच जाएँगे, लेकिन बीच रास्ते में मिलने वाले अवैध स्टैंड और सड़कों के बीचों-बीच खड़े ठेले आपके इरादों पर पानी फेर देते हैं।
दुकानों की जागीर बने फुटपाथ
कहने को तो प्रशासन हर कुछ दिनों में अतिक्रमण हटाओ अभियान (Encroachment drive) चलाता है, बुलडोज़र भी चलते हैं, लेकिन जैसे ही सरकारी गाड़ी वापस जाती है, बाज़ार फिर से वैसा ही सज जाता है। पटना की अधिकतर सड़कों पर फुटपाथ तो नाम के बचे हैं। कहीं जूतों की दुकानें सजी हैं, तो कहीं कढ़ाही में छनते समोसे पैदल चलने वालों का रास्ता रोक रहे हैं। मज़बूरी में लोगों को बीच सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे न सिर्फ जाम लगता है बल्कि हादसों का खतरा (Accident Risk) भी कई गुना बढ़ जाता है।
अवैध रिक्शा और ऑटो स्टैंड की 'गुंडागर्दी'
अतिक्रमण सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। शहर के व्यस्त इलाकों में जहाँ मर्जी हो वहीं ऑटो और रिक्शा का स्टैंड बन जाना आम बात हो गई है। ट्रैफिक पुलिस के जवानों के सामने ही ऑटो की दो-तीन कतारें लग जाती हैं, जिससे सड़क की चौड़ाई आधी रह जाती है। बोरिंग रोड और गांधी मैदान के आसपास का इलाका इसका सबसे बड़ा गवाह है। लोग जाम में फँसे घंटों चिल्लाते हैं, लेकिन ये अवैध पार्किंग व्यवस्था को धता बताते हुए शान से खड़े रहते हैं।
रोजी-रोटी बनाम सार्वजनिक सुविधा
यहाँ एक संवेदनशील पहलू भी है। बहुत से रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे दुकानदार इसी अतिक्रमण के सहारे अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी की जीविका का रास्ता करोड़ों लोगों की असुविधा से होकर गुजरना चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन विक्रेताओं के लिए कोई स्थायी 'वेंडिंग ज़ोन' (Vending Zone) नहीं बनाया जाता, तब तक पटना को जाम से मुक्ति मिलना मुश्किल है।
स्मार्ट सिटी के दावों की हकीकत
साल 2026 की इस भागदौड़ में पटना का हर नागरिक अब प्रशासन से ठोस कदम की उम्मीद कर रहा है। फ्लाइओवर और चमचमाती लाइटें तब तक शहर को स्मार्ट नहीं बना सकतीं, जब तक ज़मीनी तौर पर आम आदमी सुकून से दो कदम चल न सके। शहर में चलने वाले कछुए की रफ्तार वाले ट्रैफिक को देखकर यही लगता है कि पटना को अब "बुलडोज़र वाली सख्ती" के साथ-साथ एक "सार्थक शहरी नियोजन (Urban Planning)" की भी ज़रूरत है।
अगर हालात ऐसे ही रहे, तो शायद वो दिन दूर नहीं जब पटना के नक्शे पर सड़कें तो होंगी, लेकिन उन पर चलने के लिए ज़मीन कम पड़ जाएगी।