झारखंड में खत्म होने वाला है लेबर कोर्ट का पुराना दौर अब नए नाम और नए नियमों के साथ मिलेगा इंसाफ
News India Live, Digital Desk: अगर आप झारखंड में किसी फैक्ट्री में काम करते हैं, मजदूर हैं या किसी भी तरह के 'एम्प्लॉई' हैं, तो यह खबर आपके मतलब की है। अक्सर वेतन रोकने, बोनस न मिलने या नौकरी से निकाले जाने के विवादों के लिए हम 'लेबर कोर्ट' (श्रम न्यायालय) जाते हैं। लेकिन आने वाले दिनों में आपको यह नाम सुनने को नहीं मिलेगा। झारखंड में श्रम न्यायालयों का इतिहास बदलने जा रहा है।
केंद्र सरकार के नए नियमों के बाद अब राज्य के 13 लेबर कोर्ट्स का नाम बदलकर 'इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल' (औद्योगिक न्यायाधिकरण) किया जा रहा है।
अब जज की कुर्सी पर कौन बैठेगा?
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव सिर्फ नाम में नहीं, बल्कि फैसला सुनाने वालों में हुआ है।
अभी तक व्यवस्था यह थी कि लेबर कोर्ट में सिर्फ एक पीठासीन पदाधिकारी (Presiding Officer) होते थे, जो कि न्यायपालिका (Judiciary) यानी जजों के वर्ग से आते थे।
लेकिन, नए नियमों के मुताबिक अब जो 'इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल' बनेगा, उसमें दो सदस्यों की बेंच होगी:
- न्यायिक सदस्य (Judicial Member): यह वही पुराने जज साहब होंगे (हाईकोर्ट या जिला जज स्तर के)।
- प्रशासनिक सदस्य (Administrative Member): यह नई एंट्री है। अब सरकार के वरिष्ठ अधिकारी (श्रम विभाग के अफसर जैसे ज्वाइंट लेबर कमिश्नर आदि) भी बेंच पर बैठकर फैसला सुनाएंगे।
इसका क्या मतलब है?
आसान भाषा में समझें तो अब अदालती फैसलों में सरकार (प्रशासन) की भी सीधी भागीदारी होगी। सरकार का तर्क है कि ऐसा करने से काम का बोझ बंटेगा और लेबर विभाग के अधिकारी तकनीकी मुद्दों को बेहतर समझते हैं, जिससे फैसला व्यावहारिक होगा।
क्या मजदूरों को जल्दी न्याय मिलेगा?
झारखंड में लेबर कोर्ट्स में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। इस नई व्यवस्था का असली मकसद यही बताया जा रहा है कि मुकदमों का निपटारा तेज हो। हालाँकि, दबी जुबान में कुछ जानकारों की चिंता यह भी है कि प्रशासनिक अधिकारी के आने से कहीं 'सिस्टम' का झुकाव सरकार या नियोजकों की तरफ न हो जाए। क्योंकि जज पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं, जबकि अधिकारी सरकार के अधीन होते हैं।
नए लेबर कोड का असर
आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने पुराने 44 तरह के श्रम कानूनों को खत्म कर 4 नए 'लेबर कोड' बनाए हैं। इसी के तहत झारखंड सरकार अपनी नियमावली बदल रही है। जैसे ही राज्य कैबिनेट की मुहर लगेगी, यह पुरानी व्यवस्था इतिहास बन जाएगी और नई व्यवस्था लागू हो जाएगी।
कुल मिलाकर बदलाव बड़ा है। अब देखना यह होगा कि नाम बदलने से क्या मजदूरों की तकदीर और तस्वीर भी बदलती है या नहीं।