सारंडा के जंगलों में गूंज रहे हैं 2000 जवानों के कदम, लिखी जा रही है नक्सलवाद के खात्मे की आखिरी कहानी
News India Live, Digital Desk : झारखंड के सारंडा के जंगल इन दिनों शांत नहीं हैं। यहाँ की हवा में एक अजीब सी हलचल है। यह हलचल है 2000 जवानों के बूटों की, जो इस घने जंगल का सीना चीरकर उस डर को खत्म करने निकले हैं, जिसने सालों से यहाँ के लोगों को जकड़ रखा है। यह कोई आम तलाशी अभियान नहीं है, यह नक्सलवाद के खिलाफ झारखंड के इतिहास की सबसे बड़ी और निर्णायक लड़ाइयों में से एक है।
इस ऑपरेशन का पैमाना इतना बड़ा है कि यह सालों पहले हुए मशहूर 'ऑपरेशन एनाकोंडा' की याद दिला रहा है। उस वक्त भी सारंडा के जंगलों को नक्सलियों से मुक्त कराने के लिए इसी तरह की बड़ी घेराबंदी की गई थी। आज एक बार फिर वही इतिहास दोहराया जा रहा है, लेकिन इस बार इरादे और भी मज़बूत हैं।
जंगल के अंदर ही बना लिया ठिकाना
इस बार सुरक्षाबलों की रणनीति बिल्कुल अलग है। जवान अब सिर्फ बाहरी इलाकों में गश्त नहीं कर रहे, बल्कि उन्होंने नक्सलियों के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों के अंदर घुसकर अपने कैंप बना लिए हैं। झारखंड पुलिस, जगुआर, कोबरा बटालियन और सीआरपीएफ के ये 2000 जवान अब एक ही मकसद के साथ जंगल के चप्पे-चप्पे को छान रहे हैं - नक्सलियों के आखिरी किले को ध्वस्त करना।
निशाने पर है एक करोड़ का 'मास्टरमाइंड'
इस पूरे ऑपरेशन के केंद्र में एक ही नाम है - मिसिर बेसरा। 1 करोड़ का इनामी यह नक्सली कमांडर इस इलाके में संगठन का दिमाग माना जाता है। सुरक्षाबलों का मानना है कि अगर मिसिर बेसरा पकड़ा गया, तो इस इलाके में नक्सलवाद की कमर टूट जाएगी। कांकेर में 21 नक्सलियों के मारे जाने के बाद संगठन पहले ही कमज़ोर पड़ चुका है और अब इस बड़े ऑपरेशन ने उनकी बची-खुची हिम्मत भी तोड़ दी है।
यह लड़ाई अब बाहर से नहीं, बल्कि नक्सलियों के घर के अंदर से ही लड़ी जा रही है। जवानों ने ऐसी घेराबंदी की है कि उनके लिए भागने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। यह सिर्फ एक सैनिक अभियान नहीं, बल्कि इस इलाके को हमेशा के लिए शांति लौटाने की एक बड़ी कोशिश है। और जिस तरह से यह ऑपरेशन आगे बढ़ रहा है, ऐसा लग रहा है कि सारंडा के जंगलों में जल्द ही एक नया सवेरा होने वाला है।