झारखंड का वो गुमनाम स्टेशन, यहाँ से ट्रेन पकड़कर नेताजी ने अंग्रेजों को दे दिया था चकमा
News India Live, Digital Desk: रेलवे स्टेशन तो आपने बहुत देखे होंगे, लेकिन कुछ स्टेशन सिर्फ इमारतें नहीं होते, वे अपने सीने में इतिहास की पूरी कहानी समेटे होते हैं। झारखंड के धनबाद जिले का गोमो जंक्शन भी एक ऐसा ही स्टेशन है। आज भले ही यहाँ रोज़ाना हज़ारों यात्री आते-जाते हों, लेकिन एक रात इस स्टेशन ने कुछ ऐसा देखा था, जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई की दिशा ही बदल दी।
यह कहानी है 18 जनवरी 1941 की रात की। उस वक्त पूरा देश अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कलकत्ता में उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया गया था। अंग्रेजों को लगा था कि उन्होंने सबसे बड़े क्रांतिकारी को कैद कर लिया है, लेकिन वे नेताजी के इरादों से अनजान थे।
उसी रात, नेताजी भेष बदलकर अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर अपने घर से निकले। वे एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन के रूप में थे, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। अपनी गाड़ी से वे सीधे पहुँचे गोमो स्टेशन। यहाँ कालका मेल खड़ी थी, जो पेशावर की ओर जा रही थी। अँधेरे में, खामोशी से नेताजी उसी ट्रेन पर सवार हो गए। यह उनकी 'महानिष्क्रमण' यानी 'The Great Escape' की शुरुआत थी। गोमो स्टेशन वो आखिरी भारतीय ज़मीन थी, जहाँ से उन्होंने अपनी आज़ादी की लड़ाई को एक नया रूप देने के लिए कदम बढ़ाया था।
'मन की बात' से फिर आई याद
सालों तक यह ऐतिहासिक घटना किताबों के पन्नों में ही सिमटी रही। लेकिन हाल ही में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में इस स्टेशन का ज़िक्र किया, तो एक बार फिर पूरे देश का ध्यान इस पर गया। उन्होंने बताया कि कैसे गोमो जंक्शन नेताजी की हिम्मत और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।
आज इस स्टेशन का नाम बदलकर 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन गोमो' कर दिया गया है और यहाँ उनकी एक प्रतिमा भी लगाई गई है, जो हर यात्री को उस ऐतिहासिक रात की याद दिलाती है। यह स्टेशन सिर्फ एक रेलवे स्टॉपेज नहीं, बल्कि आज़ादी के उस महानायक की कहानी का एक जीता-जागता पन्ना है, जो हमें हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।