बजट तो मिला पर खर्च नहीं हुआ 9 महीने बीते, लेकिन आधी सरकारी योजनाओं का फंड अब भी लॉकर में बंद
News India Live, Digital Desk: केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाओं के क्रियान्वयन (Implementation) को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती तीन तिमाहियों (अप्रैल से दिसंबर) के आंकड़े बताते हैं कि 50 से अधिक बड़ी सरकारी योजनाओं का 41% बजट ही अब तक धरातल पर उतर सका है। रिपोर्ट के अनुसार, 53 प्रमुख योजनाओं में से 47 के संशोधित अनुमान (Revised Estimates) को उनके मूल बजट से कम कर दिया गया है, जो सुस्त रफ़्तार की ओर इशारा करता है।
इन बड़ी योजनाओं की रफ़्तार सबसे धीमी
रिपोर्ट में कुछ ऐसी योजनाओं का जिक्र है जिनका बजट खर्च उम्मीद से काफी कम रहा है:
जल जीवन मिशन: इस महत्वपूर्ण मिशन के लिए आवंटित ₹67,000 करोड़ में से 9 महीनों में खर्च का आंकड़ा काफी कम रहा।
पीएम श्री स्कूल (PM Schools for Rising India): ₹7,500 करोड़ के बजट के मुकाबले दिसंबर तक का वास्तविक खर्च महज ₹473 करोड़ दर्ज किया गया।
पीएम कृषि सिंचाई योजना: यहाँ बजट अनुमान ₹850 करोड़ था, जिसे संशोधित कर मात्र ₹150 करोड़ कर दिया गया है।
क्यों नहीं हो पा रहा फंड का पूरा इस्तेमाल?
बजट खर्च में इस कमी के पीछे कई तकनीकी और प्रशासनिक कारण माने जा रहे हैं:
राज्य और केंद्र का समन्वय: कई योजनाओं में राज्य सरकार और केंद्र के बीच फंड शेयरिंग (Sharing Pattern) को लेकर होने वाली देरी एक मुख्य कारण है।
प्रक्रियात्मक पेचीदगियां: फंड रिलीज करने से पहले 'यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट' (UC) जमा करने की सख्त शर्तों के कारण अगली किस्त जारी होने में समय लग रहा है।
चुनाव और आचार संहिता: कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के कारण भी विकास कार्यों की रफ़्तार पर असर पड़ा है।
कुछ योजनाओं में दिखा 'रॉकेट' जैसा उत्साह
जहाँ एक तरफ कुछ योजनाएं पिछड़ रही हैं, वहीं तीन ऐसी योजनाएं भी हैं जहाँ संशोधित अनुमान बजट से भी अधिक रहा है:
मनरेगा (MGNREGS): ग्रामीण रोजगार की मांग बढ़ने के कारण इस योजना में बजट से अधिक खर्च देखा गया।
एसटी पोस्ट-मेट्रिक स्कॉलरशिप: शिक्षा से जुड़ी इस योजना में भी फंड का भरपूर इस्तेमाल हुआ है।
नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अतिरिक्त राशि जारी की है।
सरकार की तैयारी: मार्च तक बढ़ेगी रफ़्तार?
आमतौर पर सरकारी विभागों में वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही (जनवरी-मार्च) में खर्च में तेजी देखी जाती है। सरकार को उम्मीद है कि मार्च के अंत तक कुल खर्च का आंकड़ा 75% तक पहुँच जाएगा। हालांकि, जानकारों का कहना है कि अंतिम समय में आनन-फानन में किया गया खर्च अक्सर 'गुणवत्ता' (Quality) से समझौता कर सकता है।