थार के रेगिस्तान में अमृत की जंग जहां आज भी कोसों दूर है पानी, तस्वीरों में देखें पश्चिमी राजस्थान का दर्दनाक जल संकट

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News India Live, Digital Desk : राजस्थान के सुनहरे धोरों की चमक के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जो इंसानियत को झकझोर देता है। पश्चिमी राजस्थान के थार रेगिस्तान में 'पानी' महज एक जरूरत नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का संघर्ष है। हमारी विशेष सीरीज 'मरुधर' के पहले भाग में आज हम आपको रूबरू करा रहे हैं उन इलाकों से, जहां आज भी एक मटके पानी के लिए इंसान और पशुओं को मीलों का सफर तय करना पड़ता है।

कोसों मील का सफर और एक मटका पानी: थार की नियति

जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर के सीमावर्ती गांवों में स्थिति आज भी भयावह है। यहां की महिलाएं तड़के 4 बजे उठकर पानी की तलाश में निकलती हैं। तपती रेत और 45 डिग्री से ऊपर के तापमान में 5 से 7 किलोमीटर पैदल चलना यहां की दिनचर्या का हिस्सा है। कई गांवों में तो हालात इतने खराब हैं कि बेटियों की शादी सिर्फ इस आधार पर तय होती है कि ससुराल में पानी का स्रोत नजदीक है या नहीं।

बेरियों का सहारा: जब जमीन उगलती है बूंद-बूंद पानी

जब सरकारी पाइपलाइनें सूख जाती हैं और टैंकरों की पहुंच खत्म हो जाती है, तब थार के लोगों का आखिरी सहारा बनती हैं 'बेरियां'। ये छोटी-छोटी कुइयां होती हैं जो जमीन की नमी को सोखकर बूंद-बूंद पानी इकट्ठा करती हैं।

लंबा इंतजार: एक बाल्टी पानी भरने के लिए अक्सर लोगों को 2 से 3 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है।

खारापन: कई इलाकों में भूजल इतना खारा है कि वह पीने योग्य नहीं है, लेकिन मजबूरी में लोग वही पानी पीने को मजबूर हैं।

पशुधन पर संकट: प्यास से टूटती सांसें

पश्चिमी राजस्थान की अर्थव्यवस्था पशुपालन पर टिकी है। लेकिन पानी की कमी के कारण अब यह आधार डगमगा रहा है।

"इंसान तो बोलकर मांग लेता है, पर इन बेजुबानों का क्या? गर्मियों में पानी के अभाव में दर्जनों गायें और भेड़ें दम तोड़ देती हैं।" — खींयाराम, स्थानीय पशुपालक (जैसलमेर)

पलायन की समस्या भी इसी जल संकट से जुड़ी है। पानी खत्म होते ही चरवाहे अपने पशुओं के साथ सैकड़ों किलोमीटर दूर हरियाणा या पंजाब की ओर कूच कर जाते हैं।

इन्दिरा गांधी नहर: उम्मीद की किरण या अधूरा सपना?

कहने को तो इन्दिरा गांधी नहर को राजस्थान की 'मरुगंगा' कहा जाता है, लेकिन इसकी टेल (अंतिम छोर) तक पानी पहुंचना आज भी एक बड़ी चुनौती है। नहरबंदी के दौरान स्थिति और भी विकट हो जाती है।

पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर: नहरों में लीकेज और गाद जमने से पानी का प्रवाह कम हो जाता है।

अवैध लिफ्टिंग: रसूखदार लोग रास्ते में ही पानी चोरी कर लेते हैं, जिससे सीमावर्ती गांवों के हिस्से में केवल सूखा आता है।

जल जीवन मिशन: क्या बुझेगी प्यास?

केंद्र और राज्य सरकार की 'जल जीवन मिशन' योजना के तहत हर घर नल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, कागजों पर आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन धरातल पर रेतीले धोरों के बीच पाइपलाइन बिछाना और पानी की निरंतर सप्लाई सुनिश्चित करना एक बड़ी इंजीनियरिंग और प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है।