Chhattisgarh : IAS इस्तीफे पर सस्पेंस 7 साल बाद भी मंजूर नहीं हुआ इस्तीफा, कांग्रेस से लड़ चुके हैं चुनाव
News India Live, Digital Desk: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक अधिकारी का इस्तीफा पिछले सात वर्षों से सरकारी फाइलों में दबा हुआ है, जो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। छत्तीसगढ़ कैडर के इस आईएएस अधिकारी ने राजनीति में कदम रखने के लिए साल 2017-18 के दौरान अपना त्यागपत्र सौंपा था। हैरानी की बात यह है कि इस्तीफा मंजूर न होने के बावजूद यह अधिकारी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके हैं। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर तकनीकी रूप से यह कैसे संभव है और सरकार उनके इस्तीफे को 'अटकाए' क्यों बैठी है?
ओपी चौधरी और नीलकंठ टीकाम के बीच फंसा मामला? आमतौर पर जब कोई आईएएस अधिकारी इस्तीफा देता है, तो उसे राज्य सरकार के जरिए केंद्र सरकार (DoPT) को भेजा जाता है। इस मामले में पेंच यह है कि अधिकारी ने जब इस्तीफा दिया, तब राज्य में दूसरी सरकार थी और अब स्थितियां बदल चुकी हैं। इसी तरह के मामले छत्तीसगढ़ के पूर्व आईएएस और वर्तमान मंत्री ओपी चौधरी तथा नीलकंठ टीकाम के भी रहे हैं, लेकिन उनके इस्तीफे प्रक्रिया के तहत स्वीकार कर लिए गए थे। इस विशेष मामले में केंद्र सरकार ने कुछ तकनीकी आपत्तियां जताई हैं, जिसके कारण फाइल सात साल से 'पेंडिंग' है।
इस्तीफा मंजूर हुए बिना कैसे लड़ा चुनाव? नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी अधिकारी को चुनाव लड़ने के लिए पद से मुक्त होना अनिवार्य है। इस मामले में अधिकारी ने 'स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति' (VRS) या सीधे इस्तीफे का विकल्प चुना था। चुनाव आयोग के समक्ष नामांकन के दौरान उन्होंने अपने इस्तीफे की प्रति संलग्न की थी। हालांकि, सेवा नियमों (Service Rules) के अनुसार, जब तक सरकार इस्तीफे को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करती और राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित नहीं करती, तब तक अधिकारी तकनीकी रूप से सेवा में माना जाता है। यही वजह है कि अब उनकी सर्विस स्टेटस और भविष्य की पेंशन सुविधाओं पर तलवार लटकी हुई है।
क्या है सरकार की रणनीति? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस्तीफे को लटकाए रखना एक रणनीतिक कदम भी हो सकता है। यदि अधिकारी पर कोई विभागीय जांच लंबित है या सेवा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो सरकार इस्तीफा नामंजूर कर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। दूसरी ओर, कांग्रेस से चुनाव लड़ने के कारण यह मामला अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। अधिकारी अब दिल्ली से लेकर रायपुर तक के चक्कर लगा रहे हैं ताकि उनकी 'प्रशासनिक पहचान' को अंतिम रूप से विदा किया जा सके।