Supreme Court on Hate Speech : हेट स्पीच पर SC का सख्त रुख याचिका को बताया चयनात्मक, सुधार करने का दिया निर्देश

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News India Live, Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान गहरी नाराजगी जताई, जिनमें केवल चुनिंदा नेताओं या खास समुदायों के खिलाफ दिए गए भाषणों को निशाना बनाया गया था। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हेट स्पीच के खिलाफ कोई भी गाइडलाइन या कार्रवाई किसी खास व्यक्ति के बजाय 'धर्म-निरपेक्ष' और 'व्यापक' होनी चाहिए।

1. "राजनीतिक लड़ाई का मंच न बने कोर्ट"

CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाते हुए कहा कि चुनाव नजदीक आते ही सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है। उन्होंने टिप्पणी की:"अदालत को राजनीतिक लड़ाइयों का मैदान (Playground) न बनाएं। क्या ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि चुनाव से पहले अखिल भारतीय स्तर पर प्रचार मिल सके?"

2. हाईकोर्ट जाने का निर्देश (Assam CM मामला)

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ 'मियां' शब्द के इस्तेमाल और अन्य कथित भड़काऊ भाषणों के लिए SIT जांच की मांग वाली याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा:

हाईकोर्ट की शक्ति: आप सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट क्यों आ रहे हैं? गुवाहाटी हाईकोर्ट के पास अनुच्छेद 226 के तहत व्यापक शक्तियां हैं।

बेंच की नसीहत: हाईकोर्ट को दरकिनार करना उन्हें 'निरर्थक' (Redundant) बनाने जैसा है। यदि आप वहां के फैसले से असंतुष्ट हों, तब हमारे पास आएं।

3. 'विचार' पर नियंत्रण कैसे?

सुनवाई के दौरान CJI ने एक दार्शनिक लेकिन कानूनी सवाल उठाया: "भाषण की उत्पत्ति विचार (Thought) से होती है, आप विचार को कैसे नियंत्रित कर सकते हैं?" कोर्ट ने जोर दिया कि जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है कि वे अपने नेताओं को 'संवैधानिक नैतिकता' और आपसी सम्मान का पालन करने के लिए कहें।

4. याचिका में संशोधन के लिए 2 हफ्ते का समय

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अन्य याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर कोर्ट ने उन्हें अपनी याचिकाओं में सुधार करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि याचिका ऐसी होनी चाहिए जो सभी राजनीतिक दलों और श्रेणियों पर समान रूप से लागू हो, न कि केवल एक या दो व्यक्तियों पर।

5. संवैधानिक मूल्यों का आह्वान

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और पीठ के अन्य सदस्यों ने दोहराया कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को देश में 'भाईचारे' (Fraternity) को बढ़ावा देना चाहिए। नफरत फैलाने वाले भाषण न केवल धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करते हैं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए भी खतरा हैं।

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