Sheetala Ashtami 2026 : कब है शीतला अष्टमी? जानें बासोड़ा पूजा का शुभ मुहूर्त और सप्तमी को ही क्यों बनाया जाता है बासी भोग

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News India Live, Digital Desk: हिंदू पंचांग के अनुसार, होली के ठीक आठ दिन बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का पर्व मनाया जाता है। इसे उत्तर भारत के कई हिस्सों में 'बासोड़ा' (Basoda) के नाम से भी जाना जाता है। साल 2026 में यह पर्व स्वास्थ्य और शीतलता का आशीर्वाद लेकर आ रहा है। आइए जानते हैं इस साल पूजा की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और बासी भोजन के भोग का पौराणिक महत्व।

शीतला अष्टमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में शीतला अष्टमी को लेकर तिथियों का गणित इस प्रकार है:

अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 10 मार्च 2026, मंगलवार को शाम 06:14 बजे से।

अष्टमी तिथि का समापन: 11 मार्च 2026, बुधवार को रात 08:35 बजे तक।

शीतला अष्टमी (बासोड़ा) पूजा तिथि: 11 मार्च 2026, बुधवार

पूजा का सबसे शुभ समय: 11 मार्च को सुबह 06:33 बजे से शाम 06:27 बजे तक।

बासोड़ा का खास नियम: सप्तमी को बनता है भोग

शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इसी कारण सप्तमी तिथि (10 मार्च 2026) की रात को ही माता रानी के लिए विशेष भोग तैयार कर लिया जाता है।

शीतल भोजन: अगले दिन सुबह यानी अष्टमी को माता शीतला को इसी 'बासी' भोजन का भोग लगाया जाता है।

क्या बनता है भोग में? मुख्य रूप से मीठे चावल (ओलिया), राबड़ी, दही, बाजरे की रोटी और पुए बनाए जाते हैं।

पूरा परिवार खाता है बासी खाना: माता को भोग लगाने के बाद घर के सभी सदस्य भी इसी शीतल भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

शीतला माता की पूजा का महत्व

मान्यता है कि शीतला माता आरोग्यता की देवी हैं। उनकी पूजा करने से चेचक (Chickenpox), खसरा और आंखों की बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

सफाई का संदेश: माता के एक हाथ में झाड़ू और दूसरे में शीतल जल का कलश होता है, जो स्वच्छता और शीतलता का प्रतीक है।

ऋतु परिवर्तन: यह पर्व वसंत ऋतु के जाने और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का संकेत है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय के बाद बासी भोजन का त्याग कर देना चाहिए।

पूजा विधि: कैसे करें माता को प्रसन्न?

सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से स्नान करें।

माता के मंदिर जाकर जल अर्पित करें और 'बासोड़ा' का भोग लगाएं।

माता को हल्दी, कुमकुम और अक्षत चढ़ाएं।

पूजा के बाद शीतला माता की कथा जरूर सुनें या पढ़ें।

अंत में घर के मुख्य द्वार पर हल्दी और गोबर से स्वस्तिक बनाएं।