Sheetala Ashtami 2026 Today: आज है बसौड़ा पूजन, जानें माता शीतला को क्यों लगाया जाता है बासी भोजन का भोग और क्या है शुभ मुहूर्त

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नई दिल्ली/आध्यात्मिक डेस्क: सनातन धर्म में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है, जिसे देशभर में 'शीतला अष्टमी' या 'बसौड़ा पूजन' के नाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज यानी 11 मार्च 2026 को माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उन्हें संक्रामक रोगों से सुरक्षित रखने के लिए माता शीतला की विशेष उपासना कर रही हैं। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और माता को एक दिन पहले बने हुए बासी पकवानों का ही भोग लगाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन के प्रतीक इस पर्व पर ठंडी चीजों का नैवेद्य अर्पित करना शीतलता और आरोग्यता का प्रतीक माना जाता है।

शुभ मुहूर्त और तिथि का समय

पंचांग गणना के अनुसार, चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 10 मार्च को देर रात 1 बजकर 55 मिनट पर हो चुका है, जो कि 12 मार्च को सुबह 4 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। उदया तिथि की गणना के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत और पूजन आज 11 मार्च को ही किया जा रहा है। पूजन के लिए सुबह के समय कई शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध हैं। आज सुबह 6:35 से 8:04 बजे तक 'लाभ' का चौघड़िया है, जबकि 8:04 से 9:33 बजे तक 'अमृत' का श्रेष्ठ चौघड़िया रहेगा। इसके बाद दोपहर 11:02 से 12:31 बजे तक 'शुभ' और शाम को 4:58 से 6:27 बजे तक पुनः 'लाभ' के चौघड़िया में पूजन करना कल्याणकारी होगा।

क्यों लगाया जाता है बासी भोजन का भोग?

शीतला अष्टमी की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'बासी भोजन' यानी बसौड़ा है। परंपरा के अनुसार, सप्तमी की रात को ही गुड़ या गन्ने के रस में पके मीठे चावल (ओलिया), पूड़े, दही, रबड़ी और रोटियां तैयार कर ली जाती हैं। अष्टमी की सुबह चूल्हा जलाना वर्जित होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस परंपरा को ऋतु परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है, जहां ठंडी चीजों का सेवन शरीर को गर्मी झेलने के लिए तैयार करता है। माता को ठंडे जल और कच्चे दूध से स्नान कराने के बाद इन पकवानों का भोग लगाया जाता है और अंत में परिवार के सदस्य इसी बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

शीतला माता की विशेष पूजा विधि

आज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद व्रती को 'ओम ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। पूजा के दौरान माता को जल और कच्चे दूध के मिश्रण से अभिषेक कराया जाता है। ध्यान रहे कि माता शीतला की पूजा में दीपक या अगरबत्ती नहीं जलाई जाती, क्योंकि माता को अग्नि और ताप से दूर रखा जाता है। पूजा के अंत में माता से प्रार्थना की जाती है कि "हे माता शीतला, जैसे आप स्वयं शीतल हैं, वैसे ही हमारे घर-परिवार और बच्चों के जीवन को भी शीतलता और स्वास्थ्य प्रदान करें।" आज के दिन बच्चों के माथे पर दही या चंदन का तिलक लगाना भी शुभ माना जाता है।

पौराणिक कथा: जब कुम्हारिन की दया पर प्रसन्न हुई माता

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता शीतला धरती पर भ्रमण के लिए आईं। गांव की गलियों से गुजरते समय किसी ने उनके ऊपर उबले चावल का गर्म पानी फेंक दिया, जिससे माता के शरीर पर फफोले पड़ गए और उन्हें असहनीय जलन होने लगी। उन्होंने पूरे गांव में सहायता मांगी, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की। अंत में एक निर्धन कुम्हारिन ने माता की व्यथा देखी और उन्हें शीतल बासी रोटी और दही खिलाया। ठंडे भोजन के प्रभाव से माता की जलन शांत हुई और उन्होंने प्रसन्न होकर कुम्हारिन को अपने दिव्य रूप के दर्शन दिए। माता ने उसकी दरिद्रता दूर की और वरदान दिया कि जो भी इस दिन उन्हें ठंडा भोजन अर्पित करेगा, उसके घर में कभी अन्न-धन और स्वास्थ्य की कमी नहीं होगी।