कलेक्टर बनने चली थीं, लेकिन ,कांशीराम की वो एक बात, जिसने मायावती को बना दिया यूपी का बॉस

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News India Live, Digital Desk: आज 15 जनवरी है। उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में इस तारीख का खास महत्व है क्योंकि आज बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती (Mayawati) का जन्मदिन है। चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रह चुकीं 'बहन जी' का सियासी सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। लेकिन आज जब वो अपने जन्मदिन का केक काट रही हैं, तो उनके सामने दो तस्वीरें हैं  एक वो सुनहरा अतीत, और दूसरा, आज का संघर्ष भरा वर्तमान।

जब IAS की तैयारी कर रही थीं मायावती...

बात 1977 के आसपास की है। मायावती उस समय दिल्ली में रहकर एक आम छात्रा की तरह सिविल सर्विसेज (IAS) की तैयारी कर रही थीं। उनके पिता चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर कलेक्टर (DM) बने। लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

कहा जाता है कि एक रात बामसेफ और बीएसपी के संस्थापक कांशीराम (Kanshi Ram), मायावती के घर पहुंचे। उन्होंने मायावती के तेवर और भाषण देने की कला को देख लिया था। कांशीराम ने उनसे एक ही बात कही, जिसने मायावती की पूरी दुनिया बदल दी।

कांशीराम ने कहा था— "तुम कलेक्टर क्यों बनना चाहती हो? मैं तुम्हें ऐसा नेता बनाऊंगा कि एक दिन कलेक्टर तुम्हारे सामने फाइलों पर दस्तखत करवाने के लिए लाइन में खड़े रहेंगे।"

यह बात मायावती के दिल में घर कर गई। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना छोड़ दिया और समाज के शोषितों-वंचितों की आवाज़ बनने का फैसला किया। और वाकई, वो दिन भी आया जब बड़े-बड़े अधिकारी उनके एक इशारे का इंतज़ार करते थे।

लेकिन, आज हालात बदल चुके हैं...

आज जब हम 2026 में खड़े हैं, तो बसपा की वो पुरानी धमक कहीं खोती हुई नज़र आ रही है। एक वक्त था जब 'हाथी' की चाल से विरोधी दल घबराते थे, लेकिन पिछले कुछ चुनावों के नतीजे बताते हैं कि पार्टी अपने अब तक के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है।

'अस्तित्व' बचाने की चुनौती

राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि बसपा के सामने अब 'सर्वाइवल' यानी अस्तित्व बचाने का संकट है।

  1. वोट बैंक में सेंध: बसपा का कोर वोट बैंक माना जाने वाला दलित समाज अब छिटक कर दूसरी पार्टियों की तरफ जा रहा है।
  2. युवाओं से दूरी: चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा चेहरे दलित राजनीति में नया विकल्प बन रहे हैं, जिससे मायावती की पकड़ ढीली पड़ी है।
  3. गिरता ग्राफ: विधानसभा हो या लोकसभा, सीटों का सूखा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।

कांशीराम ने मायावती को जिस मुकाम पर पहुँचाया था, उसे बनाए रखना अब 'बहन जी' के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। क्या मायावती अपने इस जन्मदिन पर पार्टी में नई जान फूंक पाएंगी? क्या वो अपने 'रूठे' वोटर्स को मना पाएंगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

खैर, राजनीति में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं। मायावती की जीवटता ने पहले भी कई बार चौंकाया है। उनके जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं!