झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला सिर्फ संदेह के आधार पर नहीं मिल सकता तलाक, दाम्पत्य अधिकारों की रक्षा पर जोर
News India Live, Digital Desk: न्यायमूर्ति सुभाष चंद की पीठ ने एक पारिवारिक अपील पर सुनवाई करते हुए वैवाहिक संबंधों की पवित्रता और कानूनी मानदंडों को रेखांकित किया है। अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस प्रमाण या 'क्रूरता' (Cruelty) के सबूत के, केवल शक की बिनाह पर तलाक की डिक्री जारी करना कानूनन गलत है।
1. क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक पति द्वारा अपनी पत्नी से तलाक की मांग से जुड़ा था।
पति का तर्क: पति का आरोप था कि उसकी पत्नी का व्यवहार ठीक नहीं है और उसका किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध है। इसी 'संदेह' के आधार पर उसने तलाक की अर्जी दी थी।
निचली अदालत का फैसला: इससे पहले फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक को मंजूरी दे दी थी।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: पत्नी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने पाया कि पति अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाया।
2. अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने कुछ कड़े और स्पष्ट निर्देश दिए:
सबूतों की अनिवार्यता: कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता या नागरिक कानूनों के तहत, "संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।"
क्रूरता की परिभाषा: केवल वैचारिक मतभेद या जीवनसाथी पर शक करना 'मानसिक क्रूरता' के दायरे में तब तक नहीं आता जब तक कि उससे दूसरे पक्ष का जीवन दूभर न हो जाए।
परिवार की स्थिरता: अदालत ने जोर दिया कि कानून का उद्देश्य परिवारों को जोड़ना है, न कि बिना किसी ठोस आधार के उन्हें तोड़ना।
3. 'दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना' (Restitution of Conjugal Rights)
अदालत ने पति की तलाक की याचिका को खारिज करते हुए पत्नी के साथ रहने के अधिकार का समर्थन किया।
धारा 9 का महत्व: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत, यदि कोई पक्ष बिना किसी उचित कारण के अलग रहता है, तो दूसरा पक्ष साथ रहने का दावा कर सकता है। इस मामले में, कोर्ट ने पाया कि पत्नी साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति केवल निराधार शक के कारण उसे अलग करना चाहता था।
4. इस फैसले का कानूनी असर
यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा जहाँ छोटी-मोटी गलतफहमियों या बिना सबूत के चरित्र हनन के आधार पर तलाक की मांग की जाती है।
झूठे आरोपों पर लगाम: यह फैसला जीवनसाथी पर लगाए जाने वाले बेबुनियाद आरोपों को हतोत्साहित करेगा।
जांच का मानक: अब फैमिली कोर्ट्स को तलाक की डिक्री देने से पहले साक्ष्यों (Evidence) की अधिक गहराई से जांच करनी होगी।