षटतिला एकादशी और संक्रांति एक ही दिन, वो दुर्लभ मौका जिसे गंवाना आप बिल्कुल नहीं चाहेंगे
News India Live, Digital Desk: हम सब जानते हैं कि जनवरी के मध्य में सूर्य देव जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो हम बड़े ही उत्साह से मकर संक्रांति मनाते हैं। पतंग उड़ाना, तिल-गुड़ के लड्डू और पवित्र नदियों में स्नान—ये सब हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन 2026 की संक्रांति इसलिए अलग है क्योंकि इसी दिन 'षटतिला एकादशी' भी है। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो ऐसा संयोग आखिरी बार साल 2003 में बना था।
ये दिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
आम दिनों में मकर संक्रांति पर सूर्य देव की पूजा होती है और एकादशी पर हम भगवान विष्णु का व्रत रखते हैं। लेकिन इस साल ये दोनों तिथियां एक साथ होने से "हरि" (विष्णु) और "हर" (शिव/सूर्य के संदर्भ में) की कृपा पाने का साल का सबसे बड़ा दिन बन गया है। इस दिन दान करने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
क्या है 'षटतिला' का मतलब?
नाम से ही साफ है—'षट' यानी छह और 'तिल'। इस दिन तिल का छह अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल करने का नियम है। इसमें तिल से नहाना, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन करना, तिल का तर्पण, तिल का दान और तिल का सेवन शामिल है। माना जाता है कि जो इस दिन काले तिल का दान करता है, उसके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।
खिचड़ी और एकादशी का पेच?
अक्सर संक्रांति पर खिचड़ी (चावल-दाल) खाना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन एकादशी के व्रत में चावल मना होते हैं। ऐसे में कई लोग इस उलझन में रहते हैं कि वे क्या करें? जो लोग पूरी निष्ठा से एकादशी का व्रत रख रहे हैं, उनके लिए शास्त्र कहते हैं कि वे चावल का त्याग करें और संक्रांति के उपलक्ष्य में केवल तिल और गुड़ की फलाहारी चीजें ग्रहण करें। आप दान में चावल-दाल की खिचड़ी का सीधा दे सकते हैं, लेकिन व्रत रखने वालों को चावल खाने से बचना चाहिए।
आप क्या कर सकते हैं?
- सुबह नहाने के पानी में थोड़े तिल जरूर डालें।
- सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में तिल डालकर सूर्य देव को जल दें।
- घर में शांति के लिए छोटा सा हवन करें जिसमें तिल की आहुति हो।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को काले तिल, कम्बल या ऊनी कपड़े दान करें।