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April 14 2026 08:40 pm

Shashi Tharoor Statement : एक तरफ जनता का प्यार, दूसरी तरफ पार्टी की तकरार, केरल कांग्रेस में सब ठीक नहीं है

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News India Live, Digital Desk: राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि अगर आपको लंबी रेस का घोड़ा बनना है, तो पार्टी लाइन (पार्टी के नियमों) पर चलना सीखना होगा। लेकिन शशि थरूर उन नेताओं में से हैं जो लीक पर चलने के बजाय अपनी राह खुद बनाने में यकीन रखते हैं। उनकी यही आदत केरल में कांग्रेस पार्टी के लिए सिरदर्द बन गई है।

तिरुवनंतपुरम से सांसद और अपनी शानदार अंग्रेजी के लिए मशहूर शशि थरूर इन दिनों अपने बयानों की वजह से फिर सुर्खियों में हैं। मुद्दा यह नहीं है कि उन्होंने क्या कहा, मुद्दा यह है कि उनके बयानों से केरल कांग्रेस के स्थानीय नेता (Local Leadership) असहज महसूस कर रहे हैं।

बेबाकी बनी मुसीबत?

थरूर साहब की खासियत है कि वे जो महसूस करते हैं, बोल देते हैं। कई बार उनका नज़रिया विरोधी पार्टी के नेताओं (चाहे वो सीएम पिनाराई विजयन हों या केंद्र के नेता) के प्रति भी नरम या तारीफ भरा होता है। एक पढ़े-लिखे और सभ्य समाज में यह अच्छी बात हो सकती है, लेकिन राजनीति तो नफा-नुकसान पर चलती है।

जब थरूर विपक्षी नेताओं के किसी काम की तारीफ करते हैं या अपनी ही पार्टी के स्टैंड से अलग राय रखते हैं, तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं (Cadre) का मनोबल टूटने लगता है। केरल के कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे जिस वामपंथी सरकार (LDF) या केंद्र सरकार के खिलाफ दिन-रात लड़ रहे हैं, हमारे अपने ही बड़े नेता उनकी तारीफ करेंगे, तो हम जनता के बीच क्या मुंह लेकर जाएंगे?

लोकल लीडर्स वर्सेस थरूर

केरल में कांग्रेस के पास वी.डी. सतीशन और के. सुधाकरन जैसे कद्दावर नेता हैं जो संगठन चला रहे हैं। लेकिन, थरूर की लोकप्रियता एक अलग लेवल पर है। युवा उन्हें पसंद करते हैं। ऐसे में, जब थरूर पार्टी लाइन से हटकर बयान देते हैं, तो स्थानीय नेताओं को लगता है कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है या अनुशासन तोड़ा जा रहा है। इसे लेकर अंदरखाने काफी खींचतान मची हुई है।

'टीम प्लेयर' या 'सोलो खिलाड़ी'?

समस्या यही है कि कांग्रेस हाईकमान (दिल्ली नेतृत्व) के सामने भी धर्मसंकट है। एक तरफ थरूर जैसा 'ग्लोबल चेहरा' है जो पढ़े-लिखे वोट बैंक को खींचता है, और दूसरी तरफ संगठन है जो ज़मीन पर बूथ-बूथ जाकर लड़ता है। थरूर के ताज़ा बयानों ने यह बहस फिर से छेड़ दी है कि क्या वे टीम के साथ खेलना पसंद करते हैं या फिर 'सोलो बैटिंग' ही उनका स्टाइल है?

भविष्य का सवाल

अगर यही हाल रहा तो आने वाले चुनावों में पार्टी को नुकसान हो सकता है। विरोधी दल (खासकर लेफ्ट और बीजेपी) कांग्रेस की इस 'आपसी कलह' को खूब मज़े लेकर भुना रहे हैं। जनता सब देख रही है। कांग्रेस को अगर केरल में अपनी पकड़ मजबूत रखनी है, तो उन्हें थरूर और संगठन के बीच 'सीज़फायर' यानी सुलह करानी ही होगी।

वरना, शायराना अंदाज वाले थरूर की बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन वोटों के गणित में पार्टी को 'खामोश' कर सकती हैं।