Shaheed Diwas 2026 : मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? फांसी से ठीक पहले भगत सिंह का वह आखिरी खत
News India Live, Digital Desk: 23 मार्च 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फांसी के फंदे को चूमने से ठीक एक दिन पहले, 22 मार्च 1931 को भगत सिंह ने अपने साथियों (कैदियों) को एक आखिरी पत्र लिखा था? उर्दू में लिखे गए इस खत का एक-एक शब्द उनकी निडरता, दूरदर्शिता और देश के प्रति अगाध प्रेम का गवाह है। उन्होंने साफ कहा था कि वे 'पाबंद' होकर नहीं जीना चाहते और उनकी मौत ही क्रांति की सबसे बड़ी जीत होगी।
भगत सिंह के आखिरी खत के प्रमुख अंश (Excerpts):
"साथियों, स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हू -कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।"
क्रांति का प्रतीक: उन्होंने लिखा, "मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दल के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था।"
मौत की सार्थकता: भगत सिंह का मानना था कि उनकी शहादत अधिक प्रभावशाली होगी। उन्होंने कहा, "अगर मैं फांसी के फंदे से बच गया, तो मेरी कमजोरियां लोगों के सामने आ जाएंगी और क्रांति का प्रतीक फीका पड़ जाएगा। लेकिन मेरे हंसते-हंसते फांसी चढ़ने पर देश की माताएं अपने बच्चों के 'भगत सिंह' बनने की आरजू करेंगी।"
अंतिम गर्व: पत्र के अंत में उन्होंने लिखा, "मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा (फांसी) का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक आ जाए।"
छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखा भावुक संदेश
फांसी से कुछ दिन पहले उन्होंने अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को भी एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने परिवार का ख्याल रखने और हिम्मत न हारने की बात कही थी। उन्होंने लिखा था, "उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफा क्या है, हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है।"
फांसी की वह आखिरी शाम: मुस्कुराते हुए बढ़े फंदे की ओर
जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जिस वक्त जेलर उन्हें लेने आया, भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "रुकिए, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।" पन्ना खत्म करने के बाद वे उठे और सुखदेव व राजगुरु के साथ 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए फांसी घर की ओर चल दिए।