डिजिटल शोर के बीच सुकून की तलाश? बुजुर्गों की ये 9 आदतें बदल देंगी आपका जीवन, तनाव होगा छूमंतर

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नई दिल्ली: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, स्मार्टफोन्स की घंटी और सोशल मीडिया के अंतहीन स्क्रॉल ने युवाओं को एक ऐसी रेस में धकेल दिया है, जहां मंजिल का पता नहीं पर थकान भरपूर है। हर कोई खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस कर रहा है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे घर के बुजुर्ग यानी 60-70 साल की पीढ़ी इतनी शांत और संतुष्ट कैसे रहती है? उनके पास कोई हाई-टेक ऐप नहीं, बल्कि जीवन का वो अनुभव और सादगी भरी आदतें हैं, जो उन्हें मानसिक रूप से फौलाद बनाती हैं।

सुबह की शुरुआत: फोन नहीं, खुद से जुड़ें

अक्सर युवा आंख खुलते ही सबसे पहले अपना फोन चेक करते हैं, जो दिन की शुरुआत तनाव से करता है। इसके विपरीत, बुजुर्गों की पहली आदत अपनी सुबह को 'डिजिटल शोर' से बचाना है। वे उठकर पहले पौधों को पानी देते हैं, खिड़की से बाहर देखते हैं या शांति से चाय की चुस्की लेते हैं। यह छोटा सा अंतराल उनके मस्तिष्क को पूरे दिन की चुनौतियों के लिए शांत और तैयार रखता है।

एनालॉग शौक और कोमल गति का जादू

बुजुर्गों की सेहत का राज जिम में घंटों पसीना बहाना नहीं, बल्कि 'निरंतरता' है। पार्क में 15 मिनट की सैर या हल्की स्ट्रेचिंग उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। साथ ही, वे उन कामों में सुकून ढूंढते हैं जिनमें वाई-फाई की जरूरत नहीं होती—जैसे बागवानी, बुनाई या अखबार पढ़ना। ये 'एनालॉग शौक' उन्हें वर्तमान क्षण (Present Moment) में जीना सिखाते हैं, जिससे डिजिटल थकान (Digital Fatigue) पास भी नहीं फटकती।

सामाजिक जुड़ाव और संतुलित भोजन का नियम

आज की पीढ़ी 'स्क्रीन' पर चैटिंग को ही रिश्ता मान बैठी है, जबकि बुजुर्ग आज भी आमने-सामने की मुलाकात या फोन पर लंबी बातचीत को प्राथमिकता देते हैं। यह भावनात्मक सहारा उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने देता। खान-पान के मामले में भी वे नियम के पक्के होते हैं। चलते-फिरते स्नैक्स खाने के बजाय, वे समय पर और बैठकर भोजन करने में विश्वास रखते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आधार है।

भावनात्मक परिपक्वता: हर बात पर प्रतिक्रिया जरूरी नहीं

जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद बुजुर्गों ने 'भावनात्मक संतुलन' की कला सीख ली है। वे हर खबर या बहस पर विचलित नहीं होते। वे जानते हैं कि कौन सी चीजें उनके नियंत्रण से बाहर हैं। यही कारण है कि वे साधारण सुखों, जैसे—अच्छी किताब या शाम की शांति-में भी उतनी ही संतुष्टि पा लेते हैं, जितनी कोई युवा अपनी सफलता के चरम पर पाता है।