Aaj Ka Panchang: असमय मौत, दुर्घटना और आत्‍महत्‍या में दुनिया से गए परिजनों का आज होगा श्राद्ध; देखें चतुर्दशी तिथि का पूरा पंचांग व शुभ मुहूर्त

Aaj Ka Panchang: असमय मौत, दुर्घटना और आत्‍महत्‍या में दुनिया से गए परिजनों का आज होगा श्राद्ध; देखें चतुर्दशी तिथि का पूरा पंचांग व शुभ मुहूर्त

 पितृ पक्ष यानी महालय का पावन पखवाड़ा अपने अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का हिंदू धर्मग्रंथों और गरुड़ पुराण में अत्यंत विशिष्ट, संवेदनशील और गूढ़ महत्व वर्णित किया गया है। पितृ पक्ष की इस चतुर्दशी को 'घायल चतुर्दशी', 'घात चतुर्दशी' या 'शस्त्रहत श्राद्ध' के नाम से जाना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार, यह एकमात्र ऐसी विशेष तिथि है जिस दिन उन पूर्वजों, परिजनों या कुल के सदस्यों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से (प्राकृतिक बुढ़ापे या बीमारी से) न होकर किसी दुर्घटना, अकाल मृत्यु, हत्या, आत्महत्या, विषपान, सर्पदंश, जल में डूबने, अग्नि दुर्घटना या युद्ध व शस्त्र के प्रहार से हुई हो। शास्त्रों का सख्त विधान है कि सामान्य या प्राकृतिक रूप से दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को कभी नहीं किया जाता; उनका श्राद्ध या तो उनकी अपनी स्वाभाविक तिथि पर अथवा सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है। यदि किसी अकाल मृत्यु का ग्रास बने परिजन की मृत्यु की वास्तविक तिथि ज्ञात न हो, तो भी उनका श्राद्ध आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को करने से उनकी भटकती अतृप्त आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

घात चतुर्दशी श्राद्ध का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व

गरुड़ पुराण और निर्णय सिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जो जीवात्माएं अपनी स्वाभाविक आयु पूरी किए बिना ही किसी आकस्मिक आपदा, दुर्घटना या अस्वाभाविक परिस्थिति के कारण देह त्याग देती हैं, उनकी आत्मा अक्सर मोह, वासना और अधूरी इच्छाओं के बंधन में फंसकर वायुमंडल में भटकती रहती है। ऐसी अशांत आत्माओं को पितृ लोक में सहज स्थान नहीं मिल पाता। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी का यह पवित्र दिन विशेष रूप से इन्हीं अतृप्त पितरों की मुक्ति के लिए समर्पित किया गया है। इस दिन विधिवत जल, काले तिल, कुशा, जौ, सफेद चंदन और गंगाजल से किया गया तर्पण उन पूर्वजों को शांति प्रदान करता है जो असमय काल के गाल में समा गए थे। मान्यता है कि यदि परिजन इस दिन उनके निमित्त नारायण बलि, त्रिपंडी श्राद्ध या सामान्य पंचबलि कर्म संपन्न करते हैं, तो पूर्वज सभी प्रकार के कष्टों और प्रेत योनि के बंधनों से मुक्त होकर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि, वंश वृद्धि और अकाल मृत्यु से रक्षा का मंगलमय आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

आज का विस्तृत दैनिक पंचांग: वार, नक्षत्र, योग और करण

आश्विन कृष्ण पक्ष की इस महत्वपूर्ण तिथि का खगोलीय और पंचांगीय विवरण ज्योतिषीय गणना के अनुसार अत्यंत विशिष्ट ऊर्जा लेकर आता है। आज के दिन सूर्य कन्या राशि में और चंद्रमा अपनी विशिष्ट स्थिति में संचरण कर रहे हैं।

  • संवत्सर व संवत: विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948 (कालयुक्त संवत्सर)।

  • मास व पक्ष: आश्विन मास, कृष्ण पक्ष।

  • तिथि: चतुर्दशी तिथि (अपराह्न काल तक प्रभावी, तदुपरांत अमावस्या तिथि का आरंभ)।

  • वार: शनिवार (शनि देव के प्रभाव वाला दिन, जो पितृ कर्म और तर्पण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है)।

  • नक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र (उपरांत हस्त नक्षत्र का प्रवेश)।

  • योग: शुक्ल योग (उपरांत ब्रह्म योग की शुरुआत)।

  • करण: शकुनि करण (उपरांत चतुष्पाद और नाग करण)।

  • सूर्य व चंद्र स्थिति: सूर्योदय कन्या राशि में और चंद्र देव कन्या राशि में गोचरस्थ रहेंगे।

  • सूर्योदय व सूर्यास्त: सूर्योदय प्रातः 06:19 बजे और सूर्यास्त सायं 05:58 बजे होगा।

श्राद्ध और तर्पण के लिए आज के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त

श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातः काल के उषाकाल में या रात्रि के समय नहीं किया जाता। शास्त्रों में दोपहर के समय को 'कुतुप' और 'रौहिण' काल कहा गया है, जो पितरों के आहार ग्रहण और तर्पण का सर्वोत्तम समय माना जाता है। आज घात चतुर्दशी पर श्राद्ध और पिंडदान संपन्न करने के लिए निम्नलिखित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ हैं:

  • कुतुप मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक। (अवधि: 46 मिनट - यह पितरों को जल और तिल अर्पित करने का सर्वोत्तम समय है)।

  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से दोपहर 01:18 बजे तक। (अवधि: 47 मिनट)।

  • अपराह्न काल (श्राद्ध का मुख्य समय): दोपहर 01:18 बजे से दोपहर 03:37 बजे तक। (इसी अवधि के भीतर ब्राह्मण भोजन, तर्पण और पिंडदान का कार्य संपन्न करना चाहिए)।

  • अभिजीत मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक (सर्वकार्य सिद्धिदायक मुहूर्त)।

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:05 बजे से दोपहर 02:51 बजे तक।

  • गोधूलि मुहूर्त: सायं 05:58 बजे से सायं 06:22 बजे तक।

आज के अशुभ काल: इन समयों में भूलकर भी न करें श्राद्ध कर्म

पितृ कर्म करते समय राहुकाल और यमगंड जैसे दूषित समयों का विशेष रूप से त्याग करना चाहिए, क्योंकि इन मुहूर्तों में किए गए तर्पण का फल पितरों को नहीं पहुंचता:

  • राहुकाल: प्रातः 09:14 बजे से प्रातः 10:41 बजे तक। (इस दौरान कोई भी नया कार्य, संकल्प या श्राद्ध का आरंभ न करें)।

  • यमगंड काल: दोपहर 01:36 बजे से दोपहर 03:03 बजे तक।

  • गुलिक काल: प्रातः 06:19 बजे से प्रातः 07:46 बजे तक।

  • दुर्मुहूर्त: प्रातः 06:19 बजे से प्रातः 07:06 बजे तक।

चतुर्दशी श्राद्ध की प्रामाणिक विधि और पंचबलि कर्म के नियम

अकाल मृत्यु से दिवंगत हुए परिजनों का श्राद्ध करते समय विशेष शुचिता और नियमों का पालन अनिवार्य है। सुबह नित्यकर्म और स्नानादि के उपरांत दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। अनामिका अंगुली में कुशा की पवित्री (अंगूठी) धारण करें। तांबे या कांसे के पात्र में शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, काले तिल, सफेद फूल और जौ मिलाकर दोनों हाथों की अंजुली से 'पितृतीर्थ' (अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग) से तर्पण दें। तर्पण के समय दिवंगत आत्मा का नाम, गोत्र और उनके मोक्ष की प्रार्थना का संकल्प लें। तर्पण के पश्चात पंचबलि कर्म अवश्य करें, जिसमें भोजन के पांच अलग-अलग ग्रास पत्तल पर निकाले जाते हैं:

  1. गौ बलि (गाय के लिए): पहली ग्रास गाय माता को खिलाएं।

  2. श्वान बलि (कुत्ते के लिए): दूसरी ग्रास काले या भूरे कुत्ते को अर्पित करें।

  3. काक बलि (कौवे के लिए): कौवे को पितरों का दूत माना जाता है, इसलिए तीसरी ग्रास छत या मुंडेर पर कौवों के लिए रखें।

  4. देवादि बलि (देवताओं व चींटियों के लिए): चौथी ग्रास चींटियों और कीट-पतंगों के निमित्त पेड़ की जड़ में डालें।

  5. पिपीलिकादि बलि (अतिथि व भिक्षुक के लिए): पांचवीं ग्रास किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण के लिए रखें। इसके पश्चात योग्य, सदाचारी ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन (खीर, पूड़ी, उड़द की दाल का बड़ा आदि) कराएं और यथाशक्ति वस्त्र, अन्न तथा दक्षिणा देकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

सामान्य मृत्यु वाले पूर्वजों का चतुर्दशी को श्राद्ध क्यों नहीं किया जाता?

धर्मशास्त्रों में इस बात की स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि किसी परिजन की मृत्यु सामान्य बुढ़ापे, बीमारी या प्राकृतिक रूप से हुई है, तो उनका श्राद्ध कभी भी आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि यदि स्वाभाविक रूप से मृत पूर्वज का श्राद्ध इस दिन किया जाता है, तो परिवार में कलह, अशांति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे पूर्वजों का श्राद्ध अगले दिन आने वाली सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन ही श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिए। घात चतुर्दशी का यह पावन दिन केवल और केवल उन दिवंगत आत्माओं के उद्धार का महापर्व है, जिन्होंने असमय इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया था। इस दिन सच्चे मन से किया गया एक लोटा जल का तर्पण भी पूर्वजों के सभी क्लेशों को मिटाकर घर-परिवार में शांति और सुरक्षा का रक्षा कवच स्थापित करता है।

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