Rajasthan Khejri Save Movement : बीकानेर में चिपको आंदोलन की यादें हुई ताजा खेजड़ी को बचाने के लिए सड़कों पर उतरा जनसैलाब

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News India Live, Digital Desk: पश्चिमी राजस्थान की पहचान और 'मरुस्थल के कल्पवृक्ष' कहे जाने वाले खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के विरोध में बीकानेर में ऐतिहासिक 'महापड़ाव' शुरू हो गया है। सौर ऊर्जा संयंत्रों (Solar Power Plants) के विस्तार के नाम पर हजारों की संख्या में खेजड़ी के हरे पेड़ों को काटे जाने से आक्रोशित ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी लामबंद हो गए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि देना उन्हें कतई मंजूर नहीं है।

बीकानेर बंद: चक्का जाम और महापड़ाव का असर

आंदोलन के समर्थन में बीकानेर के विभिन्न व्यापारिक संगठनों ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रखे हैं:

बाजार और स्कूल बंद: बीकानेर शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में स्वेच्छा से बाजार बंद रहे। निजी स्कूलों ने भी बच्चों की सुरक्षा और आंदोलन के समर्थन में छुट्टी की घोषणा की।

महापड़ाव की गूंज: हजारों की संख्या में लोग धरना स्थल पर जमा हुए हैं, जहाँ भजन-कीर्तन और नारेबाजी के जरिए सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाई जा रही है।

विवाद की जड़: सौर ऊर्जा बनाम खेजड़ी

बीकानेर क्षेत्र में कई बड़ी सौर ऊर्जा कंपनियों को जमीन आवंटित की गई है।

हजारों पेड़ों पर खतरा: ग्रामीणों का आरोप है कि ये कंपनियां सौर पैनल लगाने के लिए हजारों साल पुराने खेजड़ी के पेड़ों को बेरहमी से काट रही हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र का नुकसान: खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष (State Tree) है और यह मरुस्थल के पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है। इसे काटना न केवल कानूनी अपराध है बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था पर भी चोट है।

बिश्नोई समाज का नेतृत्व: "सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण"

अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान की परंपरा को याद करते हुए बिश्नोई समाज इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है।

प्रमुख मांगें: आंदोलनकारियों की मुख्य मांग है कि पेड़ों की कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए, पहले से काटे गए पेड़ों के बदले भारी जुर्माना लगाया जाए और भविष्य में किसी भी प्रोजेक्ट के लिए खेजड़ी को न छूने की लिखित गारंटी दी जाए।

प्रशासनिक दखल: महापड़ाव के बढ़ते दबाव को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और समझौते की कोशिशें जारी हैं।

खेजड़ी का महत्व: क्यों हो रहा है इतना विरोध?

खेजड़ी को 'रेगिस्तान का राजा' कहा जाता है।

यह अकाल के समय पशुओं और मनुष्यों के लिए भोजन (सांगरी) और चारे (लूंग) का स्रोत है।

इसकी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और पानी के स्तर को बनाए रखने में मदद करती हैं।

खेजड़ी को काटना वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और राजस्थान के स्थानीय कानूनों के तहत प्रतिबंधित है