बीजेपी के ‘जख्म 84’ सम्मेलन में क्यों शामिल नहीं हुए रवनीत बिट्टू और नायब सैनी

बीजेपी के ‘जख्म 84’ सम्मेलन में क्यों शामिल नहीं हुए रवनीत बिट्टू और नायब सैनी

वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों की 40वीं बरसी के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा आयोजित विशेष 'जख्म 84' सम्मेलन राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। इस संवेदनशील और ऐतिहासिक कार्यक्रम का उद्देश्य 1984 के पीड़ितों की आवाज़ उठाना और कांग्रेस शासन के दौरान हुए अन्यायों को उजागर करना था। हालांकि, दिल्ली में आयोजित इस भव्य सम्मेलन में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे दो प्रमुख सिख व क्षेत्रीय राजनीतिक चेहरों की गैर-मौजूदगी ने विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित कर दिया। सोशल मीडिया और मीडिया हलकों में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे कि क्या पार्टी के भीतर कोई मतभेद है या फिर इसके पीछे कोई रणनीतिक दूरी है? हालांकि, अब दोनों शीर्ष नेताओं के इस कार्यक्रम में शामिल न हो पाने की असली और प्रामाणिक वजह सामने आ गई है, जिसने तमाम अटकलों पर पूरी तरह से विराम लगा दिया है।

#1 पूर्वनियोजित प्रशासनिक कार्यक्रम और राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बनीं गैर-मौजूदगी की वजह

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के सम्मेलन में न पहुंच पाने की मुख्य वजह उनकी पूर्व निर्धारित प्रशासनिक और बजटीय बैठकें थीं। मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, हरियाणा में नई सरकार के गठन के बाद राज्य के विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था की समीक्षा और आगामी विधानसभा सत्र की तैयारियों को लेकर चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री की कई महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठकें पहले से तय थीं। चूंकि इन बैठकों का समय सीधे तौर पर दिल्ली में आयोजित 'जख्म 84' सम्मेलन के समय से टकरा रहा था, इसलिए मुख्यमंत्री सैनी को प्रशासनिक प्राथमिकताओं के चलते चंडीगढ़ में ही रुकना पड़ा। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व और आयोजकों को अपनी इस अनुपस्थिति के बारे में पूर्व में ही सूचित कर दिया था और सम्मेलन के संदेश तथा उद्देश्यों के प्रति अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया था।

#1 केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का पूर्व-निर्धारित सरकारी दौरा

दूसरी ओर, केंद्रीय रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू की अनुपस्थिति को लेकर भी मीडिया में व्यापक चर्चाएं थीं। रवनीत बिट्टू, जो खुद एक प्रमुख सिख राजनीतिक परिवार से आते हैं और जिनके दादा व पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह ने राज्य में उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, का इस सम्मेलन में होना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। हालांकि, उनके करीबी सूत्रों और मंत्रालयिक जानकारी के अनुसार, रवनीत बिट्टू उस समय रेल मंत्रालय और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र से जुड़े एक पूर्व-निर्धारित आधिकारिक सरकारी दौरे और उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकों के सिलसिले में दिल्ली से बाहर थे। आधिकारिक व्यस्तताओं और कड़े प्रोटोकॉल के कारण वे कार्यक्रम स्थल पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके, यद्यपि उन्होंने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के बीजेपी के संकल्प का पुरजोर समर्थन किया है।

#1 'जख्म 84' सम्मेलन का राजनीतिक महत्व और बीजेपी का स्पष्ट रुख

बीजेपी द्वारा आयोजित 'जख्म 84' सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की जारी लड़ाई को रेखांकित करना और विशेष जांच दल (SIT) द्वारा की गई हालिया जांच कार्रवाइयों के बारे में जनता को जागरूक करना था। सम्मेलन में पार्टी के वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं, राष्ट्रीय पदाधिकारियों और सिख समाज के प्रबुद्ध दिग्गजों ने शिरकत की। वक्ताओं ने मंच से 1984 के पीड़ितों के पुनर्वास और दोषियों को सजा दिलाने में मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का ब्योरा दिया। पार्टी प्रवक्ताओं ने नेताओं की अनुपस्थिति पर उठे सवालों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बीजेपी का हर कार्यकर्ता और नेता 1984 के पीड़ितों के दर्द के साथ मजबूती से खड़ा है और किसी नेता की प्रशासनिक व्यस्तता को राजनीतिक रंग देना पूरी तरह से अनुचित है।

#1 कयासों पर विराम और सिख राजनीति पर इस सम्मेलन का प्रभाव

नायब सिंह सैनी और रवनीत सिंह बिट्टू की अनुपस्थिति के स्पष्ट कारण सामने आने के बाद अब पंजाब और हरियाणा की राजनीति में जारी बयानबाज़ी काफी हद तक शांत हो गई है। विपक्षी दल जहां इस अनुपस्थिति को लेकर बीजेपी पर निशाना साधने की कोशिश कर रहे थे, वहीं आधिकारिक स्पष्टीकरण ने यह साफ कर दिया है कि यह केवल समय और प्रशासनिक व्यस्तताओं का टकराव था। बीजेपी का 'जख्म 84' सम्मेलन यह संदेश देने में सफल रहा है कि पार्टी 1984 के काले अध्याय को भूलने नहीं देगी और पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने तथा उन्हें न्याय दिलाने की अपनी प्रतिबद्धता पर आज भी पूरी दृढ़ता के साथ कायम है।