डीयू प्रोफेसर संगीत रागी के खिलाफ राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग में याचिका

डीयू प्रोफेसर संगीत रागी के खिलाफ राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग में याचिका

देश की राजधानी नई दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. संगीत के. रागी द्वारा एक प्रमुख राष्ट्रीय हिंदी समाचार चैनल की लाइव परिचर्चा में की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर कानूनी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। टीवी डिबेट के दौरान यादव समाज के संदर्भ में इस्तेमाल किए गए शब्दों को अमर्यादित और अपमानजनक बताते हुए इस पूरे मामले को लेकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग यानी एनसीबीसी के समक्ष एक औपचारिक शिकायत दर्ज करवाई गई है। शिकायत में सीधे तौर पर यह आरोप लगाया गया है कि एक जिम्मेदार शैक्षणिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा राष्ट्रीय टेलीविजन मंच पर इस प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार व्यक्त करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।

इस संवेदनशील मामले को कानूनी तौर पर आगे बढ़ाते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रिंस यादव ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का दरवाजा खटखटाया है। आयोग को प्रेषित अपने विस्तृत प्रार्थना पत्र में उन्होंने उल्लेख किया है कि सार्वजनिक प्रसारण माध्यमों पर किसी समुदाय विशेष की अस्मिता और सामाजिक स्थिति पर आघात करने वाली टिप्पणियां न केवल सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाती हैं बल्कि संवैधानिक मूल्यों की मूल भावना का भी उल्लंघन करती हैं। शिकायतकर्ता की ओर से आयोग से तत्काल प्रभाव से आवश्यक विधिक प्रक्रिया शुरू करने और इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है।

टीवी परिचर्चा में उठे विवाद और यादव समाज के स्वाभिमान का सवाल

शिकायतकर्ता पक्ष ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि यह कानूनी पहल किसी व्यक्तिगत रंजिश, पार्टीगत राजनीति या साधारण वैचारिक मतभेद का नतीजा नहीं है। इसका सीधा संबंध समूचे यादव समाज की सांस्कृतिक गरिमा, ऐतिहासिक पहचान, अस्मिता और सामूहिक स्वाभिमान की रक्षा से जुड़ा हुआ है। लाइव टेलीकास्ट के दौरान प्रसारित वक्तव्यों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं के बीच भी गहरा असंतोष देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि विचार-विमर्श और स्वस्थ विमर्श के नाम पर किसी भी ऐतिहासिक सामाजिक समूह को नीचा दिखाने का प्रयास किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

राष्ट्रीय स्तर पर टीवी डिबेट्स में भाषा की मर्यादा और विषय वस्तु को लेकर लंबे समय से चिंताएं जताई जाती रही हैं। प्रस्तुत प्रकरण में शिकायतकर्ता का तर्क है कि जब कोई स्थापित शिक्षक या विषय विशेषज्ञ मीडिया के मंचों पर बैठता है तो आम जनता उससे निष्पक्षता, शोधपरक तथ्यों और मर्यादित भाषा की अपेक्षा रखती है। इसके विपरीत यदि किसी मंच से ऐसी टिप्पणियां की जाती हैं जो किसी बड़े जनसमूह की भावनाओं को ठेस पहुंचाएं, तो यह अभिव्यक्ति का अधिकार न होकर सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने वाला कृत्य बन जाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह औपचारिक शिकायत आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है ताकि इस तरह की प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

संवैधानिक संस्था एनसीबीसी के समक्ष रखी गईं तीन प्रमुख मांगें

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को सौंपे गए शिकायती पत्र में अधिवक्ता प्रिंस यादव ने आयोग के विशेषाधिकारों और संवैधानिक दायित्वों का हवाला देते हुए मुख्य रूप से तीन बिंदुवार मांगें रखी हैं। पहली मांग यह की गई है कि आयोग इस गंभीर घटनाक्रम का स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध उच्च स्तरीय जांच सुनिश्चित करे। शिकायत में कहा गया है कि चूंकि यह मामला सामाजिक प्रतिष्ठा और पिछड़े वर्गों के सम्मान से जुड़ा है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता और संदर्भ की विस्तृत पड़ताल की जानी अनिवार्य है ताकि वास्तविक तथ्यों को सामने लाया जा सके।

शिकायत की दूसरी प्रमुख मांग यह है कि संबंधित शैक्षणिक संस्थान के प्राध्यापक प्रो. संगीत के. रागी को आयोग द्वारा औपचारिक नोटिस जारी किया जाए और उनसे इस सार्वजनिक वक्तव्य को लेकर लिखित में विधिवत स्पष्टीकरण तलब किया जाए। इसके साथ ही तीसरी सबसे अहम मांग के तहत यह कहा गया है कि यदि जांच और साक्ष्यों के आधार पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है, तो आयोग प्रोफेसर रागी को यह स्पष्ट निर्देश दे कि वे संपूर्ण यादव समाज से सार्वजनिक मंच पर बिना किसी शर्त के क्षमा याचना करें। शिकायतकर्ता का मानना है कि सार्वजनिक मंच पर हुए आघात का परिमार्जन केवल सार्वजनिक क्षमा और पश्चाताप के जरिए ही संभव हो सकता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादा के बीच की कानूनी सीमाएं

शिकायत दर्ज कराने के पश्चात याचिकाकर्ता अधिवक्ता प्रिंस यादव ने अपने आधिकारिक बयान में भारतीय संविधान के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों और उनके साथ जुड़ी सीमाओं की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी को भी असीमित या निरंकुश अधिकार प्रदान नहीं करता कि वह किसी जाति, वर्ग या समुदाय को सार्वजनिक तौर पर लांछित करे या समाज में जातिगत विद्वेष की भावना को बढ़ावा दे। संविधान की धारा 19(1)(ए) जहां बोलने की आजादी की गारंटी देती है, वहीं 19(2) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और मानहानि से बचाव के लिए युक्तियुक्त प्रतिबंधों का भी स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

अधिवक्ता प्रिंस यादव ने अपने बयान में आगे जोड़ा कि किसी व्यक्ति का बड़ा पद, उसकी अकादमिक उपाधियां, सामाजिक प्रभाव या टीवी चैनलों पर उसकी बार-बार मौजूदगी उसे यह लाइसेंस नहीं दे देती कि वह किसी ऐतिहासिक समुदाय का सार्वजनिक अपमान करने की चेष्टा करे। उन्होंने कहा कि उनका यह संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि उस संकीर्ण मानसिकता, जातिवादी पूर्वाग्रह और गैर-बराबरी की सोच के खिलाफ है जो किसी भी वर्ग को कमतर आंकने या उनके प्रति अपमानजनक भाषा को सहज मान लेने की हिमायत करती है। समाज की प्रतिष्ठा, संवैधानिक गरिमा और आत्मसम्मान से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता।

कानूनी विशेषज्ञों की राय और आगे की संभावित संवैधानिक कार्रवाई

कानूनी जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338बी के तहत स्थापित एक शक्तिशाली संवैधानिक निकाय है। आयोग को पिछड़े वर्गों के अधिकारों के संरक्षण, उनके सामाजिक हितों पर कुठाराघात की शिकायतों की जांच करने तथा आवश्यक होने पर समन जारी करने और गवाहों को बुलाने हेतु दीवानी अदालत यानी सिविल कोर्ट के समतुल्य शक्तियां प्राप्त हैं। यदि आयोग इस मामले में प्राप्त शिकायत और वीडियो फुटेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्रारंभिक तौर पर संज्ञान लेने योग्य पाता है, तो वह संबंधित पक्षों को उपस्थित होने और जवाब दाखिल करने का कानूनी आदेश दे सकता है।

शिकायतकर्ता ने भी इस बात को दोहराया है कि वे इस पूरे प्रकरण को लेकर बेहद गंभीर हैं और जरूरत पड़ने पर इसे अन्य संवैधानिक, न्यायिक एवं वैधानिक मंचों तक ले जाने से पीछे नहीं हटेंगे। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल वर्तमान घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में किसी भी मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक समूहों के विरुद्ध होने वाली गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी को रोकने के लिए एक कानूनी नजीर साबित होनी चाहिए। फिलहाल सबकी निगाहें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अगली कार्रवाई और आयोग द्वारा इस मामले में जारी किए जाने वाले संभावित निर्देशों पर टिकी हुई हैं।