छत्तीसगढ़ के इस अनोखे गांव में एक हफ्ते पहले मनती है दिवाली

छत्तीसगढ़ के इस अनोखे गांव में एक हफ्ते पहले मनती है दिवाली

देशभर में जहां दीपावली का त्योहार कार्तिक अमावस्या की पावन तिथि पर बड़े ही धूमधाम और हरषोल्लास के साथ मनाया जाता है, वहीं भारत के दिल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ राज्य में एक ऐसा अनोखा गांव भी है जहां का पारंपरिक नियम और धार्मिक आस्था पूरी दुनिया से बिल्कुल अलग है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित 'सेमरा' गांव (Semra Village) में देश के बाकी हिस्सों से ठीक एक सप्ताह (7 दिन) पहले ही दिवाली का पर्व मना लिया जाता है। सदियों से चली आ रही इस अनोखी परंपरा के पीछे कोई आधुनिक सोच या प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि गांव के रक्षक और आराध्य देवता 'सिरदार देव' का दिव्य आदेश जुड़ा हुआ है। आस्था, विश्वास और देव-आज्ञा का यह मेल इतना अटूट है कि गांव का हर एक परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी संशय के इसी अनूठी परंपरा का पालन करता आ रहा है।

#1 जानिए क्या है सिरदार देव का आदेश और क्यों बदला गया दिवाली का समय?

धमतरी जिले के सेमरा गांव में दीपावली त्योहार को समय से पहले मनाने के पीछे एक बेहद दिलचस्प और पौराणिक जनश्रुति प्रचलित है। गांव के बुजुर्गों और पूजा-पाठ से जुड़े सिरदार देव मंदिर के बैगा (पुजारी) के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पूर्व गांव में भीषण प्राकृतिक आपदाएं, बीमारियां और अनहोनी घटनाएं घटने लगी थीं। फसलों को भारी नुकसान पहुंचता था और गांव में असमय मौतों का सिलसिला शुरू हो गया था। इस भयंकर संकट से मुक्ति पाने के लिए गांव के सभी बड़े-बुजुर्गों ने अपने कुलदेवता और ग्राम देवता 'सिरदार देव' की विशेष पूजा-अर्चना की और उनसे मार्गदर्शन मांगा। मान्यता है कि सिरदार देव ने ग्राम बैगा के माध्यम से यह दिव्य संदेश दिया कि देश के बाकी हिस्सों के साथ दिवाली मनाने से गांव पर अनिष्ट और संकट बना रहेगा, इसलिए सेमरा गांव के लोग मुख्य दिवाली से ठीक सात दिन पहले देवारी (दिवाली) की पूजा संपन्न करें।

#1 देव-आज्ञा का उल्लंघन करने पर आती है विपदा, पूरे गांव में है अटूट विश्वास

स्थानीय लोगों का मानना है कि सिरदार देव के इस आदेश को स्वीकार करने के बाद गांव से संकट के काले बादल छंट गए और चारों तरफ सुख-समृद्धि तथा खुशहाली का माहौल बन गया। तब से लेकर आज तक गांव का कोई भी ग्रामीण सिरदार देव के इस नियम को तोड़ने की गलती नहीं करता। ग्रामीणों का कहना है कि अतीत में जब भी किसी परिवार ने आधुनिक सोच या अन्य कारणों से मुख्य दिवाली के दिन पूजा करने की कोशिश की या परंपरा का उल्लंघन किया, तो उस परिवार को किसी न किसी शारीरिक, मानसिक या आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि गांव के युवा, बुजुर्ग और महिलाएं पूरी निष्ठा के साथ एक हफ्ता पहले ही दिवाली की तैयारियों में जुट जाते हैं और अपने आराध्य देव की छत्रछाया में सुरक्षित महसूस करते हैं।

#1 कैसे मनाया जाता है एक हफ्ते पहले दिवाली का यह पावन पर्व?

सेमरा गांव में दिवाली मनाने का उत्साह किसी भी बड़े त्योहार से कम नहीं होता। तय तिथि से पहले ही पूरे गांव के मिट्टी के घरों की लिपाई-पुताई की जाती है, आंगन में सुंदर रंगोलियां सजाई जाती हैं और दीप जलाकर रोशनी की जाती है। सबसे पहले गांव के मुख्य देवस्थान पर जाकर 'सिरदार देव' को नया चावल, धान की बालियां और पारंपरिक प्रसाद अर्पित किया जाता है। इसके बाद सभी ग्रामवासी अपने-अपने घरों में माता लक्ष्मी और भगवान धनवंतरी की विधिवत पूजा करते हैं। इस दिन गांव में मवेशियों (गायों और बैलों) की पूजा का विशेष महत्व होता है, जिन्हें सोहाई बांधकर और सजाकर विशेष पकवान खिलाए जाते हैं। पूरे गांव में दीये जलाकर आतिशबाजी की जाती है और मिष्ठान बांटे जाते हैं।

#1 छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पर्यटन का नया केंद्र

छत्तीसगढ़ का यह छोटा सा गांव अब केवल स्थानीय आस्था तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि अपनी इस अनोखी और अनूठी परंपरा के कारण पूरे प्रदेश और देश भर के शोधकर्ताओं, सांस्कृतिक विशेषज्ञों तथा पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बन चुका है। दिवाली के मौसम में आसपास के क्षेत्रों से कई लोग सेमरा गांव पहुंचकर इस अलौकिक परंपरा का जीवंत अनुभव करते हैं। सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी अनेक लोक-परंपराएं और देव-आज्ञाएं जीवित हैं, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और अटूट लोक-विश्वास को दर्शाती हैं। सेमरा गांव की यह अनूठी दिवाली इसी अनमोल सांस्कृतिक धरोहर का एक स्वर्णिम प्रतीक है।