बागी TMC विधायकों की अयोग्यता मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया साफ इनकार, याचिकाकर्ता को कलकत्ता हाई कोर्ट जाने का दिया निर्देश

बागी TMC विधायकों की अयोग्यता मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया साफ इनकार, याचिकाकर्ता को कलकत्ता हाई कोर्ट जाने का दिया निर्देश

भारतीय राजनीति, पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों और न्यायपालिका से जुड़ी एक बहुत ही बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) गुट को एक बड़ा झटका देते हुए बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि वे इस मामले को लेकर सीधे कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख करें। इस राजनीतिक उठापटक और कानूनी दांव-पेंच के बीच देश भर की निगाहें एक बार फिर बंगाल की राजनीति पर टिक गई हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कुछ कहा है और तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों से जुड़ा यह पूरा कानूनी विवाद क्या है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का किया निपटारा, कलकत्ता हाई कोर्ट जाने की दी सख्त सलाह

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉएमाल्य बागची की पीठ ने टीएमसी नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा दायर की गई उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे बागी विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने वाली याचिकाओं पर जल्द से जल्द अपना फैसला सुनाएं।

सर्वोच्च अदालत की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए याचिका का निपटारा कर दिया और याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वे अपनी बात रखने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट जाएं। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया के अपने नियम और चरण होते हैं, और इस तरह के मामलों की शुरुआत निचली अदालतों या संबंधित उच्च न्यायालय से ही होनी चाहिए।

हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से डिवीजन बेंच के समक्ष मामला सूचीबद्ध करने का आग्रह

सुप्रीम कोर्ट ने केवल याचिका खारिज करने या सुनवाई से इनकार करने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि मामले की महत्ता को देखते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से एक विशेष अनुरोध भी किया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि वे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह करते हैं कि इस पूरे मामले को तत्काल प्रभाव से एक डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए और इस पर बिना किसी अनावश्यक देरी के जल्द से जल्द फैसला लिया जाए।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता शोभनदेब चट्टोपाध्याय की पैरवी कर रहे वकील ने दलील दी कि बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की ये याचिकाएं इसी साल 8 जुलाई को दाखिल की गई थीं, लेकिन पांच महीने से अधिक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी विधानसभा अध्यक्ष की ओर से इस पर कोई फैसला नहीं आया है। इस पर न्यायमूर्ति जॉएमाल्य बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा, "हम आपकी बात की पूरी संवेदनशीलता समझते हैं, लेकिन केवल इसलिए कि आप अपनी बारी से पहले सुनवाई पाना चाहते हैं, इसके लिए सीधे सर्वोच्च अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता और हर मामले को यहीं नहीं लाया जाना चाहिए।"

क्या है पूरा मामला? टीएमसी विधायकों का पाला बदलना और नेता प्रतिपक्ष का विवाद

यह पूरा सियासी घमासान पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय शुरू हुआ जब टीएमसी के भीतर बड़ी टूट देखने को मिली। इस साल 8 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस के कई असंतुष्ट और बागी विधायकों—जिनमें ऋतब्रत बनर्जी, फिरहाद हकीम, अरूप रॉय, संदीपन साहा, अखरुज्जमां अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मीन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष के नाम प्रमुख हैं—के खिलाफ अयोग्यता की याचिकाएं दायर की गईं। इन सभी बागी नेताओं पर यह गंभीर आरोप है कि वे पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पाला बदलकर दूसरे गुट में शामिल हो गए हैं।

इस राजनीतिक उठापटक के कारण विधानसभा के भीतर भी नेतृत्व को लेकर जबरदस्त खींचतान देखने को मिली। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को सदन में 'नेता प्रतिपक्ष' के रूप में नामित किया था, लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट के विधायक ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी और एक अन्य बागी विधायक को मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त कर दिया। इस फैसले के खिलाफ पहले भी कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिकाएं डाली जा चुकी हैं, जहां अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर तुरंत कोई अंतरिम हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। बागी गुट का यह भी दावा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के कुल विधायकों में से कम से कम 58 विधायक उनके समर्थन में खड़े हैं। अब देखना यह होगा कि कलकत्ता हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच इस राजनीतिक और कानूनी रूप से पेचीदा मामले पर क्या और कब फैसला सुनाती है।