दुनिया की टॉप कंपनियां चलाते हैं IITian, फिर भी ग्लोबल टॉप 100 रैंकिंग से बाहर क्यों

दुनिया की टॉप कंपनियां चलाते हैं IITian, फिर भी ग्लोबल टॉप 100 रैंकिंग से बाहर क्यों

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी IIT देश का सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक ब्रांड माना जाता है। गूगल के सुंदर पिचाई से लेकर माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला (आईआईटीियन वातावरण से प्रेरित) और दुनिया भर की फॉर्च्यून 500 कंपनियों में शीर्ष पदों पर बैठे दर्जनों दिग्गज इसी आईआईटी व्यवस्था की उपज हैं। भारत में आईआईटी में एडमिशन पाना किसी सपने के सच होने जैसा होता है और हर साल लाखों युवा जेईई एडवांस की परीक्षा में बैठते हैं। लेकिन जब बात क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग (QS World University Rankings) या टाइम्स हायर एजुकेशन (THE) जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक सूचियों की आती है, तो भारत का एक भी आईआईटी दुनिया के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में अपनी जगह बनाने में संघर्ष करता दिखता है। आखिरकार ऐसा क्यों है कि जिस संस्थान के पढ़े छात्र दुनिया भर में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं, वह संस्थान खुद वैश्विक रैंकिंग में पिछड़ जाता है? इस यक्ष प्रश्न का जवाब एक पूर्व आईआईटीियन (Ex-IITian) ने सोशल मीडिया पर बेहद बेबाकी से दिया है, जिसमें उन्होंने इसके पीछे के 3 मुख्य और कड़वे कारण उजागर किए हैं।

रिसर्च और पेटेंट की जगह जॉब पैकेज और प्लेसमेंट पर अत्यधिक फोकस

पूर्व छात्र के अनुसार, पहला और सबसे बड़ा कारण यह है कि आईआईटी का पूरा इकोसिस्टम रिसर्च और इनोवेशन की जगह केवल 'प्लेसमेंट' और 'करोड़ों के पैकेज' के इर्द-गिर्द घूमता है। दुनिया की टॉप 100 यूनिवर्सिटीज जैसे एमआईटी (MIT), स्टैनफोर्ड या कैम्ब्रिज में रैंकिंग का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा इस बात पर निर्भर करता है कि वहां कितना उच्च स्तरीय शोध (High-Impact Research) हो रहा है, कितने अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट फाइल हो रहे हैं और शोध पत्रों को कितनी बार साइट (Citations per Faculty) किया जा रहा है। इसके विपरीत, भारत में आईआईटी को महज एक 'हाई-एंड जॉब एजेंसी' के रूप में देखा जाता है, जहां छात्र प्रवेश लेते ही कोडिंग सीखने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में 1 करोड़ रुपये का पैकेज हासिल करने की रेस में लग जाते हैं। मौलिक शोध और मौलिक आविष्कारों पर ध्यान न होने के कारण आईआईटी वैश्विक रिसर्च पैरामीटर्स पर पिछड़ जाते हैं।

फैकल्टी-टू-स्टूडेंट रेशियो और अंतरराष्ट्रीयता (International Diversity) की भारी कमी

ग्लोबल रैंकिंग एजेंसियां किसी भी संस्थान को आंकते समय वहां के अंतरराष्ट्रीय माहौल को बहुत अधिक वजन (Weightage) देती हैं। पूर्व छात्र ने दूसरा कारण बताते हुए कहा कि टॉप 100 में शामिल विश्वविद्यालयों में दुनिया भर से छात्र पढ़ने आते हैं और वैश्विक स्तर के प्रोफेसर्स पढ़ाते हैं। लेकिन भारतीय आईआईटी में 'इंटरनेशनल स्टूडेंट्स' और 'फॉरेन फैकल्टी' का प्रतिशत न के बराबर यानी लगभग शून्य है। कड़े नियमों, वीजा प्रक्रियाओं और कम प्रतिस्पर्धी वेतन ढांचे के कारण दुनिया भर के शीर्ष शोधकर्ता या विदेशी छात्र भारत के आईआईटी का रुख नहीं करते। इसके साथ ही, आईआईटी में लगातार बढ़ रही सीटों के कारण 'शिक्षक-छात्र अनुपात' (Faculty-to-Student Ratio) भी वैश्विक मानकों के मुकाबले काफी असंतुलित हो चुका है, जिससे व्यक्तिगत ध्यान और मेंटरशिप का स्तर प्रभावित होता है।

सरकारी फंडिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएं और इंडस्ट्री-अकादमिक लिंकेज का अभाव

तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण फंडिंग मॉडल और इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएं हैं। हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड या एमआईटी जैसे वैश्विक संस्थानों के पास अरबों डॉलर का निजी एंडोमेंट फंड (Endowment Fund) होता है, जो उन्हें एलुमनाई (पूर्व छात्रों) के भारी दान से मिलता है। इस विशाल धनराशि का उपयोग वे अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं बनाने, महंगे रिसर्च उपकरण खरीदने और वैज्ञानिकों को स्वतंत्रता देने में करते हैं। वहीं, भारत के आईआईटी काफी हद तक सरकारी बजट और बजटीय आवंटन पर निर्भर रहते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी के पूर्व छात्रों ने फंड देना शुरू किया है, लेकिन यह वैश्विक स्तर के मुकाबले अभी भी बहुत कम है। इसके अलावा, भारत में उद्योगों (Industries) और आईआईटी के बीच वैसा गहरा गठजोड़ नहीं है जैसा अमेरिका या यूरोप में देखने को मिलता है, जहां कंपनियां सीधे यूनिवर्सिटीज में रिसर्च प्रोजेक्ट्स को फंडिंग देती हैं।

सुधार की दिशा में उठते कदम और भविष्य की उम्मीदें

हालांकि, स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मद्रास जैसे प्रमुख संस्थानों ने अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पार्क स्थापित किए हैं और पूर्व छात्रों के वैश्विक नेटवर्क को जोड़कर फंड जुटाना शुरू किया है। शिक्षा मंत्रालय की 'इन्स्टिट्यूशन ऑफ एमिनेंस' (IoE) योजना के तहत भी आईआईटी को अधिक स्वायत्तता और वित्तीय सहायता दी जा रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि भारत को अपने आईआईटी को वैश्विक टॉप 50 या टॉप 100 में देखना है, तो हमें अपनी सोच को केवल 'सैलरी पैकेज' से आगे बढ़ाकर 'अत्याधुनिक रिसर्च और ग्लोबल इनोवेशन' पर केंद्रित करना होगा।