चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर उमड़ा किसानों का जनसैलाब, मांगों के समर्थन में गरजी महापंचायत

चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर उमड़ा किसानों का जनसैलाब, मांगों के समर्थन में गरजी महापंचायत

पंजाब और हरियाणा के बीच स्थित चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर एक बार फिर देश की सबसे बड़ी कृषि और राजनीतिक हलचलों का केंद्र बन गया है। यहाँ आयोजित की गई किसानों की विशाल महापंचायत में हजारों की संख्या में पहुंचे किसानों ने अपनी विभिन्न लंबित और जायज मांगों को लेकर जोरदार हुंकार भरी। दूर-दराज के गांवों से ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और पैदल मार्च के जरिए पहुंचे अन्नदाताओं के चेहरे पर सरकार के रवैये के खिलाफ साफ गुस्सा और निराशा साफ झलक रही थी। महापंचायत के दौरान किसान संगठनों के शीर्ष नेताओं ने एक स्वर में कहा कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, लेकिन यदि प्रशासन और सरकार ने उनकी सुध नहीं ली, तो यह रोष एक बड़े और उग्र जनआंदोलन का रूप ले सकता है। बॉर्डर पर जुटी भारी भीड़ और पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी ने एक बार फिर राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक गलियारों की धड़कनों को तेज कर दिया है, जहाँ हर कोई किसानों के इस नए तेवर पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है।

आखिर क्या हैं किसानों की मुख्य मांगें और क्यों सुलग रहा है अन्नदाताओं का यह रोष

इस महापंचायत के दौरान किसानों ने अपने संबोधन में उन तमाम अनसुनी मांगों को फिर से जोर-शोर से उठाया, जिन्हें लेकर वे लंबे समय से संघर्षरत हैं। किसानों का मुख्य दर्द इस बात को लेकर है कि ऐतिहासिक आंदोलनों के दौरान सरकार ने जो लिखित आश्वासन और वादे किए थे, वे आज तक कागजों और फाइलों से बाहर नहीं आ सके हैं। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर कानूनी गारंटी का कानून बनाने की मांग आज भी इस आंदोलन की सबसे बड़ी और मुख्य रीढ़ बनी हुई है। इसके अलावा, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू करना, लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को वास्तविक न्याय दिलाना, किसानों और मजदूरों के संपूर्ण कर्ज को माफ करना तथा कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली बिजली और डीजल पर मिलने वाली राहत को सुनिश्चित करना जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। वक्ताओं ने मंच से दो टूक शब्दों में कहा कि सरकारें कॉरपोरेट घरानों को तो तमाम तरह की टैक्स छूट और सहूलियतें दे रही हैं, लेकिन पसीना बहाकर देश का पेट भरने वाले किसान को अपनी ही मेहनत का वाजिब दाम पाने के लिए सड़कों पर धक्के खाने पड़ रहे हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली पर फूटा किसानों का गहरा गुस्सा

महापंचायत के मंच से किसान नेताओं ने केंद्र सरकार के साथ-साथ पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों की नीतियों पर भी जमकर निशाना साधा। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे और लोकलुभावन घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद राजनेता किसानों की समस्याओं को पूरी तरह से भूल जाते हैं। पुलिस बैरिकेडिंग, रास्तों की किलेबंदी और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगाकर किसानों की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है, जिसे देश का अन्नदाता अब और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। किसानों का कहना है कि वे अपनी ही राजधानी में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने आए थे, लेकिन प्रशासन ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया मानो वे देश के नागरिक नहीं बल्कि कोई बाहरी अपराधी हों। इस दोहरे रवैये और प्रशासनिक अड़चनों के कारण किसानों के भीतर का असंतोष उफान पर है, जो आने वाले दिनों में सरकारों के लिए एक बड़ी राजनीतिक मुसीबत का सबब बन सकता है।

आंदोलन की अगली रणनीति और एकता का संदेश देने को तैयार बैठे हैं किसान

चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर की इस महापंचायत में सिर्फ रोष ही व्यक्त नहीं किया गया, बल्कि आने वाले दिनों के लिए एक मजबूत और धारदार रणनीति की रूपरेखा भी तैयार की गई। विभिन्न किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों ने आपस में लंबी मंत्रणा के बाद यह निर्णय लिया है कि यदि सरकार ने समय रहते उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो आंदोलन के दायरे को पूरे देश में और अधिक व्यापक बनाया जाएगा। गांवों और कस्बों में जनसंपर्क अभियान चलाकर युवाओं और महिलाओं को इस हक की लड़ाई से जोड़ा जाएगा। नेताओं ने स्पष्ट कर दिया कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या एक राज्य की नहीं है, बल्कि देश के हर उस नागरिक की है जो अन्न से लेकर जीवन तक की बुनियादी जरूरतों से जुड़ा हुआ है। महापंचायत के अंत में सभी ने एकजुट होकर यह संकल्प लिया कि जब तक सरकार एमएसपी गारंटी कानून समेत सभी वादों को अमलीजामा नहीं पहना देती, तब तक उनका यह शांतिपूर्ण लेकिन कड़ा संघर्ष निरंतर जारी रहेगा।

प्रशासनिक चौकसी और कानून-व्यवस्था के बीच शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ महापंचायत

किसानों के इस भारी जमावड़े को देखते हुए चंडीगढ़ और मोहाली दोनों ही प्रशासन पूरी तरह से अलर्ट मोड पर नजर आए। बॉर्डर क्षेत्र में भारी पुलिस बल, रैपिड एक्शन फोर्स और पैरामिलिट्री फोर्सेज के जवानों को तैनात किया गया था ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में बनी रहे। हालांकि, प्रशासन की तमाम पाबंदियों और कड़े सुरक्षा पहरे के बावजूद किसानों ने अनुशासन का परिचय देते हुए अपनी महापंचायत को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न किया। यातायात के मोर्चे पर जरूर कुछ देर के लिए रूट डायवर्जन करना पड़ा जिससे आम नागरिकों को हल्की असुविधा का सामना करना पड़ा, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति नियंत्रण में रही। यह महापंचायत एक बार फिर यह साबित कर गई है कि भारतीय किसान अपनी जमीन, अपने अधिकार और अपने भविष्य को लेकर कितने ज्यादा सजग और प्रतिबद्ध हैं, और जब तक उनकी आवाज अनसुनी होती रहेगी, तब तक सड़कों पर इस तरह की हुंकार गूंजती ही रहेगी।