पंजाब चुनाव से पहले सुखबीर सिंह बादल को बड़ा झटका; मायावती की बीएसपी ने अकाली दल से किनारा कर अकेले लड़ने का किया ऐलान
त्तर भारतीय राजनीति के गलियारों से इस वक्त एक बेहद अहम और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने आने वाले विधानसभा चुनावों के समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पंजाब की राजनीति में एक बड़ा दांव चलते हुए शिरोमणि अकाली दल के साथ चल रहे गठबंधन को लेकर बड़ा और स्पष्ट रुख साफ कर दिया है। मायावती के इस फैसले से अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा काफी तेज हो गई थी कि क्या दोनों दल आगामी चुनावों में एक बार फिर मिलकर ताल ठोकेंगे, लेकिन बीएसपी सुप्रीमो ने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए यह घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी पंजाब में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी सीटों पर पूरी ताकत के साथ अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। इस फैसले के बाद से राज्य की क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है और विरोधी दलों ने भी इस पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं।
अकाली दल और बीएसपी के पुराने गठबंधन का इतिहास और टूटने की मुख्य वजहें
शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी का साथ आना कोई नया घटनाक्रम नहीं है, बल्कि इसका इतिहास तीन दशक पुराना रहा है। सबसे पहले साल 1996 में प्रकाश सिंह बादल और बीएसपी के संस्थापक कांशी राम ने लोकसभा चुनाव के लिए हाथ मिलाया था, जिसका परिणाम बेहद शानदार रहा था और दोनों दलों ने मिलकर कई सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इसके बाद बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और कृषि कानूनों के विरोध के दौरान साल 2021 में एक बार फिर दोनों दलों ने पुरानी कड़वाहट को भुलाकर आपसी सहमति से गठबंधन किया था। उम्मीद जताई जा रही थी कि पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने को साधने के लिए यह जोड़ी आने वाले समय में भी बरकरार रहेगी। लेकिन अंदरखाने चल रही बैठकों और जमीनी फीडबैक की समीक्षा करने के बाद मायावती ने यह महसूस किया कि पार्टी के कैडर और सांगठनिक विस्तार के लिए अकेले चुनाव लड़ना ही सबसे बेहतर विकल्प होगा। स्थानीय वरिष्ठ नेताओं और पार्टी पदाधिकारियों के साथ हुई मैराथन बैठकों में यह बात खुलकर सामने आई कि गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने से पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं का मनोबल और जनाधार उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पा रहा है जिसकी उम्मीद की जाती है।
दलित बहुल सीटों पर टिकी हैं निगाहें, क्या अकेले चुनाव लड़ने से बदलेगा सियासी समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की कुल आबादी में दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब बत्तीस प्रतिशत के आसपास है, जो देश के किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले सबसे अधिक है। यही वजह है कि राज्य की सत्ता की चाबी हमेशा से दलित वोटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दोआबा और मालवा क्षेत्र के कई जिलों में बीएसपी का एक परंपरागत और वफादार मतदाता वर्ग माना जाता रहा है। पिछले विधानसभा चुनावों में जब अकाली दल और बीएसपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था, तब पार्टी ने गठबंधन के तहत कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और नवांशहर सीट पर जीत भी दर्ज की थी। अब जब मायावती ने अकेले चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया है, तो अकाली दल के लिए उन पारंपरिक दलित वोटों तक अपनी सीधी पहुंच बनाना खासा चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। जानकारों का कहना है कि इस फैसले से भले ही कुल मत प्रतिशत पर आंशिक असर पड़े, लेकिन राजनीतिक मोलभाव और सीटों के समीकरण के लिहाज से अकाली दल के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक झटका अवश्य है।
सुखबीर सिंह बादल के सामने खड़ी हुई दोहरी चुनौतियां और आगामी चुनावी रण
एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को लेकर पहले से ही अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था, वहीं अब बीएसपी के अलग होने से शिरोमणि अकाली दल की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के सामने अपने पुराने और खिसकते हुए जनाधार को बचाने की एक बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है। पिछले कुछ समय से लगातार चुनावी झटके झेल रही पार्टी के लिए यह समय अस्तित्व की लड़ाई जैसा बनता जा रहा है। पार्टी के भीतर से भी कई कद्दावर नेता और पुराने चेहरे समय-समय पर नेतृत्व शैली और फैसलों पर सवाल खड़े करते रहे हैं। ऐसे में बीएसपी का यह स्पष्ट संदेश कि वे किसी के बैसाखी के सहारे मैदान में नहीं उतरेंगे, अकाली दल के रणनीतिकारों को अपनी रणनीति पूरी तरह से नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर रहा है। दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी के इस कदम से सूबे का चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय होने की पूरी संभावना बन गई है, जहां हर एक पार्टी अपने दम पर आम जनता और खास तौर पर पिछड़े तथा वंचित वर्ग को साधने के लिए नए वादे और दावे कर रही है।
पंजाब की राजनीति में नए गठजोड़ और जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होगा आने वाला चुनाव
जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, राजनीतिक दलों की गतिविधियां और बयानबाजी भी तेज होती जा रही है। मायावती के इस फैसले ने यह साबित कर दिया है कि वे पंजाब में पार्टी के स्वतंत्र वजूद और पहचान के साथ कोई समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। बीएसपी का यह स्वतंत्र रुख राज्य के उन युवाओं और मतदाताओं को भी अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करेगा जो पारंपरिक दलों की नीतियों से लंबे समय से असंतुष्ट चले आ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अकाली दल इस बड़े राजनीतिक झटके से उबरने के लिए क्या नई रणनीति अपनाता है और अन्य दल इस खाली हुई राजनीतिक जगह का फायदा उठाने के लिए किस प्रकार की व्यूह रचना तैयार करते हैं। फिलहाल, पंजाब के राजनीतिक आसमान पर यह फैसला एक बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है और हर कोई यही आकलन करने में जुटा है कि इस स्वतंत्र और कड़े कदम का आगामी विधानसभा चुनाव के मतपेटी पर कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा।