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April 19 2026 01:08 am

पितृसत्ता एक बीमारी है पत्नी की हत्या करने वाले पति की उम्रकैद बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

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News India Live, Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में न केवल एक अपराधी की सजा बरकरार रखी है, बल्कि समाज की गहरी जड़ों में बैठी रूढ़िवादिता पर भी कड़ा प्रहार किया है। पत्नी की बेरहमी से हत्या करने वाले एक व्यक्ति की अपील को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'पितृसत्तात्मक सोच एक गंभीर बीमारी है'। कोर्ट ने माना कि घर की चारदीवारी के भीतर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा इसी मानसिकता का परिणाम है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला और सजा का आधार?

मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसने अपनी पत्नी की जान ले ली थी। निचली अदालतों द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद दोषी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस की पीठ ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर माना कि यह अपराध क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि पुरुष प्रधान समाज में अक्सर पत्नियों को निजी संपत्ति समझने की भूल की जाती है, जो अंततः इस तरह के जघन्य अपराधों का कारण बनती है।

सुप्रीम कोर्ट की 'सर्जिकल स्ट्राइक' जैसी टिप्पणी

फैसला सुनाते हुए जजों ने टिप्पणी की कि पितृसत्ता (Patriarchy) समाज के लिए उस कैंसर की तरह है जो समानता के अधिकार को खत्म कर देती है। कोर्ट ने कहा, "यह सोचना कि पति अपनी पत्नी के जीवन और निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है, एक मानसिक विकार है।" शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक संबंधों में सम्मान और बराबरी अनिवार्य है। यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी पर वर्चस्व जमाने के लिए हिंसा का सहारा लेता है, तो कानून उसे कड़े से कड़ा सबक सिखाएगा।

समाज और न्यायपालिका के लिए बड़ा संदेश

इस फैसले को महिला अधिकारों की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि घरेलू हिंसा के मामलों में किसी भी प्रकार की सहानुभूति या 'पारिवारिक मामला' समझकर ढिलाई नहीं दी जाएगी। उम्रकैद की सजा को बरकरार रखकर कोर्ट ने समाज को यह संदेश दिया है कि न्याय की नजर में जेंडर आधारित हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। यह निर्णय उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो आज भी पितृसत्तात्मक बेड़ियों और डर के साये में जी रही हैं।