Odisha Politics : पास कराया बिल, अब बोले नहीं चाहिए पैसा आखिर क्या है BJP विधायकों का प्लान
News India Live, Digital Desk: राजनीति में 'मूड' कब बदल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। अभी ओडिशा से एक ऐसी खबर आई है जिसने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में अगर जनता आंखें तरेर ले, तो बड़े-बड़े नेताओं को अपने फैसले पलटने पड़ते हैं। बात हो रही है नेताओं की सैलरी की वही मुद्दा जो हमेशा हम मध्यम वर्गीय (Middle Class) लोगों के दिल पर छुरियाँ चला देता है।
अभी हाल ही में ओडिशा विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास किया था। प्लान यह था कि विधायकों (MLAs) की सैलरी को तीन गुना बढ़ा दिया जाए। जी हाँ, आपने सही सुना तीन गुना! मतलब अगर किसी की कमाई 10-20 हजार बढ़ती है तो वो पार्टी देता है, यहाँ तो वेतन को लाखों में ले जाने की तैयारी थी। लेकिन जैसे ही यह बिल पास हुआ, एक अजीब सा सियासी ड्रामा शुरू हो गया।
"पहले हाँ, फिर ना" - आखिर माजरा क्या है?
शुरुआत में तो सब ठीक था। वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव पर सबने सहमति जताई। आखिर बढ़ा हुआ पैसा किसे बुरा लगता है? लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब यह खबर विधानसभा की चारदीवारी से बाहर निकली। बाहर लोग महंगाई, बेरोजगारी और अपनी छोटी-मोटी तनख्वाह को लेकर संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में नेताओं की यह "बंपर लॉटरी" जनता को रास नहीं आई। सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे, और चाय की दुकानों पर चर्चा गर्म हो गई।
अब हुआ ये है कि BJP के ही विधायकों ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।
जी हाँ, वही विधायक जो सत्ता पक्ष में हैं, उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी (Mohan Charan Majhi) से मुलाकात की है। खबर है कि उन्होंने एक ज्ञापन (Memorandum) देकर कहा है— "सीएम साहब, इस वेतन बढ़ोतरी को होल्ड पर डालिए या इसे वापस लीजिये। हमें यह बढ़ा हुआ पैसा नहीं चाहिए।"
अब आप सोच रहे होंगे कि रातों-रात नेताओं का मन कैसे बदल गया? इसे कहते हैं 'जनता का डर'।
विपक्ष का 'मास्टरस्ट्रोक' और नैतिक दबाव
इस पूरे खेल को पलटने में एक बड़ी भूमिका विपक्ष की भी रही। पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (Naveen Patnaik) ने साफ कह दिया कि वो यह बढ़ा हुआ वेतन स्वीकार नहीं करेंगे। जब इतना बड़ा नेता—जिसने दशकों तक ओडिशा पर राज किया हो—सादा जीवन का उदाहरण पेश करे, तो नई नवेली सरकार और उसके विधायकों पर 'नैतिक दबाव' (Moral Pressure) तो बन ही जाता है।
शायद BJP विधायकों को लगा कि अगर नवीन बाबू ने पैसे ठुकरा दिए और हमने चुपचाप जेब में रख लिए, तो जनता के बीच इमेज खराब हो जाएगी। अगला चुनाव भी तो लड़ना है भाई!
सैलरी या साख? क्या चुनेंगे नेता जी?
देखा जाए तो यह सिर्फ सैलरी का मुद्दा नहीं है, यह 'साख' (Goodwill) बचाने की लड़ाई है। विधायक समझ गए हैं कि इस वक्त 3 लाख रुपये महीने की सैलरी लेना, सियासी आत्महत्या करने जैसा हो सकता है।
सोचिए जरा, एक तरफ राज्य की आंगनवाड़ी दीदियां, पारा टीचर्स और संविदा कर्मचारी अपने हक़ के लिए लड़ रहे हों, और दूसरी तरफ उनके प्रतिनिधि अपनी झोली भर रहे हों—यह तस्वीर अच्छी तो नहीं लगती।
फिलहाल, बीजेपी विधायकों के इस इनकार ने सीएम मोहन माझी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। क्या बिल वापस होगा? या फिर कोई बीच का रास्ता निकलेगा? यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन एक बात तो तय है दोस्तों—जनता जगी हुई हो, तो मनमानी करना आसान नहीं होता।
आपका क्या सोचना है?
क्या नेताओं ने डर कर यह फैसला बदला है या वाकई में उन्हें जनता की फ़िक्र है? क्या एक विधायक की सैलरी इतनी ज्यादा होनी भी चाहिए? कमेंट करके अपनी बेबाक राय जरूर बताएं!