क्या आपका पसंदीदा स्नैक है सेहत के लिए धीमा जहर? पैकेज्ड फूड्स पर आएगा 'रेड फ्लैग' खतरे का निशान, पैकेट खरीदने से पहले 10 बार सोचेंगे आप

क्या आपका पसंदीदा स्नैक है सेहत के लिए धीमा जहर? पैकेज्ड फूड्स पर आएगा 'रेड फ्लैग' खतरे का निशान, पैकेट खरीदने से पहले 10 बार सोचेंगे आप

नई दिल्ली। सुपरमार्केट की चमचमाती शेल्फ पर सजे चिप्स के पैकेट, बच्चों के पसंदीदा चॉकलेट बिस्कुट, 2 मिनट में तैयार होने वाले नूडल्स, फ्रोजन स्नैक्स और रंग-बिरंगे पैक्ड ड्रिंक्स—जिन्हें स्वाद और भूख मिटाने के लिए हर रोज करोड़ों भारतीय धड़ल्ले से खरीद रहे हैं, क्या वे असल में आपकी सेहत के लिए धीमा जहर साबित हो रहे हैं? देश में लाइफस्टाइल से जुड़ी गंभीर बीमारियों—मोटापा (Obesity), टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कम उम्र में दिल के दौरों के बढ़ते मामलों के बीच भारत के सर्वोच्च न्यायालय और खाद्य सुरक्षा नियामक के गलियारों से एक बहुत बड़ा नीतिगत बदलाव आकार ले रहा है। देश में बिकने वाले सभी पैकेज्ड फूड्स के फ्रंट यानी सामने वाले हिस्से पर अब एक बड़ा 'रेड वार्निंग लेबल' (Red Flag Warning Symbol) अनिवार्य करने की तैयारी चल रही है, जिसे देखते ही उपभोक्ता समझ जाएगा कि यह उत्पाद उसकी सेहत के लिए कितना हानिकारक हो सकता है।

अब तक पैकेज्ड फूड कंपनियां पैकेट के पिछले हिस्से पर बेहद छोटे और बारीक अक्षरों में न्यूट्रिशनल चार्ट (पोषण संबंधी जानकारी) छापकर अपना पल्ला झाड़ लेती थीं, जिसे आम उपभोक्ता न तो ठीक से पढ़ पाता था और न ही समझ पाता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों और जनहित याचिकाओं के दबाव के बाद भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) पर अब 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग' (FOPL) नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू करने का चौतरफा दबाव बन चुका है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: 'लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं चल सकता'

सुप्रीम कोर्ट में पैकेज्ड फूड्स में अत्यधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा (Saturated Fat) की अनिवार्य फ्रंट लेबलिंग को लेकर दायर एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी कि बहुराष्ट्रीय और घरेलू फूड कंपनियां भारतीय उपभोक्ताओं को अंधेरे में रखकर ऐसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ बेच रही हैं, जो यूरोपीय और अमेरिकी मानकों के मुकाबले कहीं अधिक अस्वास्थ्यकर हैं।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरिकों का स्वास्थ्य और स्वच्छ खान-पान संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले 'जीवन के अधिकार' (Right to Life) का अभिन्न हिस्सा है। सुनवाई के दौरान जब FSSAI की ओर से नियमों को लागू करने में हितधारकों (इंडस्ट्री) से परामर्श का हवाला देते हुए मोहलत मांगी गई, तो अदालत ने साफ कर दिया कि नियामक की यह हीला-हवाली देश की भावी पीढ़ी को डायबिटीज और दिल की बीमारियों की राजधानी बनाने की ओर धकेल रही है। अदालत के इस कड़े रुख के बाद FSSAI ने पैकेज्ड फूड्स के फ्रंट पर चेतावनी लेबल के संशोधित मसौदे को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज कर दी है।

क्या है HFSS फूड्स और पैकेज्ड फूड पर क्यों लगेगा 'लाल खतरे का निशान'?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी पैकेज्ड फूड को HFSS (High in Fat, Sugar, and Salt) की श्रेणी में तब रखा जाता है, जब उसमें निर्धारित दैनिक सीमा से अधिक सोडियम (नमक), रिफाइंड शुगर (चीनी) या सैचुरेटेड/ट्रांस फैट मौजूद होता है।

प्रस्तावित 'रेड फ्लैग' या 'रेड ऑक्टागन' वॉर्निंग सिस्टम के तहत नियम यह तय किए जा रहे हैं:

  • फ्रंट-ऑफ-पैक डिस्प्ले: पैकेट के मुख्य फ्रंट डिस्प्ले एरिया के कम से कम 10 से 15 प्रतिशत हिस्से पर लाल रंग का एक स्पष्ट चेतावनी बॉक्स या सिंबल होगा।

  • सामग्री की स्पष्ट पहचान: यदि किसी स्नैक में नमक की मात्रा मानक से अधिक है, तो उस पर लाल निशान के साथ लिखा होगा—"HIGH IN SALT", यदि अत्यधिक चीनी है तो "HIGH IN SUGAR" और वसा अधिक होने पर "HIGH IN SATURATED FAT"

  • स्टार रेटिंग का विरोध: फूड इंडस्ट्री लंबे समय से 'हेल्थ स्टार रेटिंग' (1 से 5 स्टार) लागू करवाने की पैरवी कर रही थी, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और बाल रोग विशेषज्ञों (IAP) ने इसका पुरजोर विरोध किया। विशेषज्ञों का कहना है कि स्टार रेटिंग भ्रामक होती है (कंपनियां थोड़ा सा फाइबर या प्रोटीन जोड़कर अस्वास्थ्यकर उत्पाद को भी 3 या 4 स्टार दिलवा लेती हैं)। इसके विपरीत, 'रेड फ्लैग' सीधा और स्पष्ट चेतावनी संदेश देता है कि उत्पाद में खतरा है।

आपके पसंदीदा स्नैक्स में छिपा है बीमारी का चक्रव्यूह

भारतीय बाजार में बिकने वाले लोकप्रिय पैकेज्ड स्नैक्स की सच्चाई किसी को भी चौंका सकती है:

  1. आलू के चिप्स और नमकीन भुजिया: चिप्स के एक सामान्य 50 ग्राम के पैकेट में एक वयस्क की पूरे दिन की अनुशंसित सोडियम (नमक) सीमा का 40% से 60% हिस्सा मौजूद होता है। इसके अलावा, इन्हें पाम ऑयल में डीप-फ्राई किया जाता है, जो धमनियों को ब्लॉक करने वाले बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) को बढ़ाता है।

  2. क्रीम बिस्कुट और ब्रेकफास्ट सीरियल्स: बच्चों के पसंदीदा बिस्कुट के 4 से 5 पीस में ही 3 से 4 चम्मच के बराबर छिपी हुई चीनी (Hidden Sugar) होती है। जिसे 'हेल्दी' बताकर बेचा जाता है, उन पैकेज्ड कॉर्नफ्लेक्स या एनर्जी ड्रिंक्स में भी फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप की भरमार होती है।

  3. इंस्टेंट नूडल्स और रेडी-टू-ईट मील्स: नूडल्स के टेस्टमेकर में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG) और सोडियम का स्तर अत्यधिक ऊंचा होता है, जो बच्चों में बचपन के मोटापे (Childhood Obesity) और कम उम्र में फैटी लिवर की मुख्य वजह बन रहा है।

रेड वार्निंग लेबल से कैसे बदलेगा भारतीय बाजार और आपकी थाली?

चिली, मैक्सिको और ब्राजील जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में जब पैकेज्ड फूड्स पर काले और लाल रंग के फ्रंट वार्निंग लेबल्स अनिवार्य किए गए, तो वहां के उपभोक्ता व्यवहार में क्रांतिकारी बदलाव देखा गया। चिप्स, कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक्स और जंक फूड्स की बिक्री में 25% से 30% तक की भारी गिरावट आई। इसका सबसे बड़ा सकारात्मक असर यह हुआ कि फूड कंपनियों को मजबूरन अपने उत्पादों से चीनी, नमक और वसा की मात्रा घटाकर नए और स्वस्थ फॉर्मूले विकसित करने पड़े।

भारत में भी जब यह रेड सिंबल अनिवार्य हो जाएगा, तो कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के हाथ में चिप्स या कोल्ड ड्रिंक का डिब्बा थमाने से पहले पैकेट पर छपे लाल खतरे के निशान को देखकर सोचने पर मजबूर होंगे। यह नियम न केवल उपभोक्ताओं को जागरूक विकल्प चुनने की ताकत देगा, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी अपने अनहेल्दी प्रोडक्ट्स को 'न्यूट्रिशियस' या 'एनर्जी से भरपूर' बताकर फर्जी विज्ञापन चलाने से हमेशा के लिए रोक देगा।