उरी हमले के बाद भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के 10 साल पूरे: बदली देश की नई सैन्य रणनीति और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम

उरी हमले के बाद भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के 10 साल पूरे: बदली देश की नई सैन्य रणनीति और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम

भारतीय सैन्य इतिहास में 29 सितंबर की तारीख एक ऐसी स्वर्णिम और निर्णायक उपलब्धि के रूप में दर्ज है, जिसने देश की रक्षा नीति और रणनीतिक सोच को हमेशा के लिए बदल दिया। आज भारत वर्ष 2016 में नियंत्रण रेखा (LoC) के पार अंजाम दी गई ऐतिहासिक सर्जिकल स्ट्राइक के पूरे 10 वर्ष (एक दशक) पूरे कर रहा है। यह वह साहसिक सैन्य कार्रवाई थी जिसने दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि नया भारत आतंकवाद के खिलाफ केवल कूटनीतिक बयानों और विरोध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर घर में घुसकर मुंहतोड़ जवाब देने की पूरी क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति रखता है।

इस ऐतिहासिक कदम ने आने वाले वर्षों में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ बड़े, निर्णायक और आक्रामक अभियानों की रूपरेखा तैयार की। यह सर्जिकल स्ट्राइक सीधे तौर पर 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी (Uri) सेक्टर स्थित आर्मी ब्रिगेड मुख्यालय पर हुए उस कायरतापूर्ण आतंकी हमले के खिलाफ की गई त्वरित और सटीक जवाबी कार्रवाई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

उरी का वह काला दिन: जब 19 वीर सैनिकों ने दी सर्वोच्च शहादत

वर्ष 2016 के सितंबर महीने की शुरुआत भारतीय सुरक्षा बलों के लिए बेहद दर्दनाक रही थी। जैश-ए-मोहम्मद (JeH) के पाकिस्तानी आतंकियों ने 18 सितंबर की सुबह उरी में सेना के शिविर पर सोए हुए जवानों पर अचानक फिदायीन हमला बोल दिया था। इस भीषण आतंकी हमले में डोगरा रेजिमेंट की 10वीं बटालियन और बिहार रेजिमेंट की 6वीं बटालियन के कुल 19 वीर जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। हमले के दौरान टेंट और बैरकों में आग लगने के कारण भारी क्षति हुई थी।

इससे पहले साल 2014 के मोहुरा कैंप हमले और साल 2016 की शुरुआत में पंजाब के पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकवादी हमलों ने देश के भीतर गहरी नाराजगी पैदा कर दी थी। उरी की इस घटना ने सरकार और सेना के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि अब इस प्रकार के दुस्साहस का ऐसा कड़ा जवाब दिया जाए जो दुश्मन के रोंगटे खड़े कर दे।

जब पैरा कमांडोज ने नियंत्रण रेखा पार कर तबाह किए आतंकी लॉन्च पैड्स

उरी हमले के महज दो सप्ताह के भीतर भारतीय सेना के उच्च नेतृत्व ने बेहद गोपनीय और अचूक योजना तैयार की। 28 और 29 सितंबर 2016 की दरमियानी रात भारतीय सेना की विशिष्ट और पराक्रमी इकाई 'पैरा स्पेशल फोर्सेज' (Para SF) के कमांडोज ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए नियंत्रण रेखा को पार किया और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की सीमा में गुप्त रूप से प्रवेश किया।

भारतीय जवानों ने एलओसी से 500 मीटर से लेकर 2 किलोमीटर अंदर तक घुसकर भिम्बर, हॉटस्प्रिंग, केल और लीपा सेक्टरों में बने कुल 7 कुख्यात आतंकी लॉन्च पैड्स को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया। लगभग पांच घंटे तक चले इस अत्यंत जोखिम भरे अभियान को सुबह 4:30 बजे सफलतापूर्वक समाप्त किया गया और भारत के सभी कमांडोज बिना किसी नुकसान के सुरक्षित अपनी सीमा में वापस लौट आए। खुफिया एजेंसियों के अनुमानों के अनुसार, इस त्वरित कार्रवाई में 35 से 70 कट्टर आतंकवादी मारे गए थे।

उस दौरान श्रीनगर स्थित 15 कोर के कमांडर रहे सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ के अनुसार, उस दौर में पठानकोट से लेकर लगातार हो रही वारदातों के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर ने दुश्मन के घर में घुसकर प्रहार करने की राजनीतिक अनुमति और पूरा समर्थन दिया था। इस अभियान ने न केवल आतंकियों के बुनियादी ढांचे को तहस-नहस किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि भारतीय सेना किसी भी परिस्थिति से निपटने में सक्षम है।

2016 की सर्जिकल स्ट्राइक क्यों थी ऐतिहासिक और गेम-चेंजर

सैन्य दृष्टिकोण से देखें तो नियंत्रण रेखा पर स्थानीय स्तर पर सीमित कार्रवाइयां अतीत में भी होती रही थीं, लेकिन 2016 की यह सर्जिकल स्ट्राइक अपने विशाल पैमाने और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा इसे खुलकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए जाने के कारण बिल्कुल अलग और ऐतिहासिक थी। इस पूरी योजना में प्रधानमंत्री कार्यालय और तत्कालीन सेना प्रमुख की सीधी निगरानी थी, साथ ही सेना को अपनी रणनीति बनाने और उसे क्रियान्वित करने की पूर्ण स्वायत्तता दी गई थी। इस पराक्रम ने देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंचा दिया और आगे चलकर इसी ऐतिहासिक घटना पर बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' भी बनाई गई।

ऑपरेशन सिंदूर तक का सफर: बदल चुकी है भारत की आतंकवाद-रोधी नीति

वर्ष 2016 की इस साहसिक कार्रवाई ने भारत की पारंपरिक आतंकवाद-रोधी नीति को 'रणनीतिक संयम' (Strategic Restraint) से बदलकर 'प्रत्यक्ष, आक्रामक और मुखर जवाबी कार्रवाई' (Proactive Retaliation) में तब्दील कर दिया। आतंकी ठिकानों को सीधे उनके घर में निशाना बनाने का यही मॉडल साल 2019 में पुलवामा हमले के बाद 'बालाकोट एयर स्ट्राइक' के रूप में दोहराया गया, जो वर्ष 1971 के युद्ध के बाद पहली बार सीमा पार वायुसेना का सामरिक उपयोग था।

इसी मजबूत और अडिग नीति का विस्तार आने वाले वर्षों में भी देखने को मिला, जब आधुनिक निगरानी उपकरणों, ड्रोन तकनीक और सटीक मारक क्षमता का उपयोग करते हुए पीओके और पड़ोसी देश के भीतर छिपे आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक प्रहार किए गए। पिछले एक दशक में भारत की जमीनी और आंतरिक सुरक्षा में अभूतपूर्व सकारात्मक बदलाव आया है। सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशों में भारी कमी दर्ज की गई है, घाटी में युवाओं का आतंकवाद की ओर रुझान लगभग समाप्त हो चुका है, और जम्मू-कश्मीर ने पिछले कई दशकों की तुलना में अपने सबसे शांतिपूर्ण, सुरक्षित और प्रगतिशील दौर को अनुभव किया है।