भारत की पहली LNG ट्रेन हाइड्रोजन ट्रेन से कितनी है अलग, दोनों की पावर, टेक्नोलॉजी और पर्यावरण पर असर
पर्यावरण संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाने और जीवाश्म ईंधन यानी डीजल पर निर्भरता को कम करने के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की दिशा में भारतीय रेलवे ने एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया है। अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन के सफल संचालन के लगभग 10 महीने बाद अब भारतीय रेलवे ने देश की पहली तरल प्राकृतिक गैस (LNG - Liquefied Natural Gas) से चलने वाली ट्रेन का भी विधिवत शुभारंभ कर दिया है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात के साबरमती रेलवे स्टेशन से देश की इस पहली एलएनजी ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर रेलवे से जुड़े ₹1,500 करोड़ रुपये से अधिक लागत के कई अन्य विकास प्रोजेक्ट्स भी राष्ट्र को समर्पित किए गए, जिनमें दोहरीकरण (Doubling), कवच ट्रेन सुरक्षा प्रणाली (Kavach Safety System), ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और WAG-12 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के लिए आधुनिक मेंटेनेंस शेड शामिल हैं।
भारत की पहली LNG ट्रेन की तकनीक और विशेषताएं
भारत की यह पहली एलएनजी से संचालित होने वाली ट्रेन आने वाले समय में रेलवे के ग्रीन ट्रांजिशन में अहम भूमिका निभाएगी। यह अत्याधुनिक ट्रेन डुअल-फ्यूल (Dual-Fuel यानी डीजल और एलएनजी दोनों) तकनीक पर आधारित है, जिसे विशेष रूप से ड्राइविंग पावर कारों (DPCs) के लिए विकसित किया गया है। साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1,400 हॉर्सपावर (HP) क्षमता वाली दो DPCs को इस डुअल-फ्यूल टेक्नोलॉजी से लैस करने के लिए मॉडिफाई किया गया है।
इस नई तकनीक की वास्तविक कार्यक्षमता और विश्वसनीयता को परखने के लिए इन संशोधित DPCs का 2,000 किलोमीटर से अधिक का सफल फील्ड ट्रायल किया जा चुका है। रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, इस डुअल-फ्यूल सिस्टम के उपयोग से पारंपरिक डीजल की खपत में सीधे तौर पर 40 प्रतिशत तक की भारी कमी लाई जा सकती है। यह तकनीक इंजन को फ्यूल की उपलब्धता के आधार पर अपने आप एलएनजी या डीजल पर स्विच करने की सुविधा देती है, जिससे ट्रेन बिना किसी रुकावट के लंबी दूरी तय कर सकती है।
ईंधन की बचत और लंबी दूरी का सफर
प्रत्येक मॉडिफाइड DPC में लगभग 2,200 लीटर क्षमता वाला एक मजबूत एलएनजी क्रायोजेनिक टैंक लगाया गया है, जिसमें लगभग 850 से 900 किलोग्राम उपयोग योग्य एलएनजी सुरक्षित आ सकती है। एलएनजी का यह एक पूरा टैंक ट्रेन को लगभग 1,600 किलोमीटर तक का सफर तय करने में सक्षम बनाता है, जिससे बार-बार ईंधन भरवाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
फिलहाल यह देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल डेमू (DEMU) ट्रेन गुजरात के साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच 8 डिब्बों वाली नॉन-एसी चेयर कार के रूप में चलाई जा रही है। पर्यावरण के मोर्चे पर बात करें तो इस प्रणाली से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और हानिकारक पार्टिकुलेट मैटर (PM) के उत्सर्जन में भारी गिरावट आती है, जो भारतीय रेलवे के 'नेट जीरो कार्बन एमिशन' के लक्ष्य को पूरा करने में मददगार साबित होगा।
हाइड्रोजन ट्रेन बनाम LNG ट्रेन: दोनों तकनीकों में क्या है मुख्य अंतर
रेलवे की इन दोनों महत्वाकांक्षी वैकल्पिक-ईंधन प्रणालियों (Alternative Fuel Systems) में तकनीकी रूप से बड़ा अंतर है। आइए इसे आसान भाषा में समझें:
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हाइड्रोजन ट्रेन (Hydrogen Train): यह ट्रेन एक उन्नत फ्यूल-सेल (Fuel-Cell) आधारित प्रोपल्शन सिस्टम पर काम करती है। यह ट्रेन के भीतर ही हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया (Chemical Reaction) से बिजली पैदा करती है। इसके संचालन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके बाई-प्रोडक्ट के रूप में केवल जल-वाष्प (Water Vapor) निकलती है, और इससे किसी भी प्रकार का धुआं या कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच किया जा चुका है।
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LNG ट्रेन (Liquefied Natural Gas Train): यह ट्रेन एक पारंपरिक इंटरनल-कंबशन इंजन का उपयोग करती है, जिसे डुअल-फ्यूल एलएनजी-डीजल सिस्टम में अपग्रेड किया जाता है। यह इंजन मुख्य रूप से डीजल के साथ एलएनजी का मिश्रण इस्तेमाल करता है, जिससे डीजल की खपत 40% तक कम होती है, लेकिन यह पूरी तरह शून्य-उत्सर्जन (Zero-Emission) प्रणाली नहीं है।
पर्यावरण और भविष्य की दृष्टि से कौन है अधिक बेहतर
पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी के लिहाज से विश्लेषण किया जाए तो हाइड्रोजन ट्रेन, एलएनजी ट्रेन की तुलना में अधिक स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल मानी जाती है, क्योंकि हाइड्रोजन तकनीक में ज़ीरो टेलपाइप एमिशन होता है। हालांकि, देश के विशाल रेल नेटवर्क और मौजूदा बुनियादी ढांचे को देखते हुए, एलएनजी डुअल-फ्यूल तकनीक को मौजूदा डीजल इंजनों पर कम लागत और तेजी से लागू किया जा सकता है। भारतीय रेलवे की ये दोनों आधुनिक तकनीकें आने वाले कल के भारतीय परिवहन को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम हैं।