इंदिरा एकादशी 2026: क्या बेटी भी कर सकती है पितरों के लिए श्राद्ध और व्रत, सही तिथि, नियम और तर्पण की पूरी विधि
सनातन हिंदू धर्म में एकादशी की तिथि को अत्यंत पवित्र और भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। यह तिथि केवल उपवास का दिन नहीं है, बल्कि जगत के पालनहार श्री हरि का स्मरण कर उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने का उत्तम अवसर होती है। साल में आने वाली सभी 24 एकादशियों में से 'इंदिरा एकादशी' का अपना एक विशिष्ट और अद्वितीय धार्मिक महत्व है। वैदिक पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को 'इंदिरा एकादशी' (Indira Ekadashi 2026) के रूप में मनाया जाता है।
इस वर्ष इंदिरा एकादशी का यह पावन व्रत पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के बीच पड़ रहा है, जिसके कारण इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना अधिक बढ़ गया है। पितृ पक्ष के दिनों में विष्णु आराधना और पितृ तर्पण का यह दुर्लभ संयोग पूर्वजों को मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है। आइए जानते हैं कि इस साल इंदिरा एकादशी की सही तिथि क्या है, यह व्रत कौन-कौन रख सकता है और क्या बेटियां अपने पितरों की शांति के लिए इस व्रत का पालन कर सकती हैं।
इंदिरा एकादशी 2026 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार को तड़के 2 बजकर 7 मिनट पर होगा। वहीं, इस तिथि का समापन 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को रात्रि 12 बजकर 34 मिनट पर होगा। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, इस वर्ष इंदिरा एकादशी का व्रत 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार के दिन ही रखा जाएगा। व्रत का पारण द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के पश्चात नियमों के अनुसार किया जाएगा।
इंदिरा एकादशी का व्रत कौन-कौन रख सकता है
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, एकादशी का व्रत किसी भी आयु, लिंग या वैवाहिक स्थिति के व्यक्ति द्वारा रखा जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है। परिवार के विवाहित पुरुष और महिलाएं तो इस व्रत का पालन करती ही हैं, साथ ही अविवाहित लड़के और लड़कियां भी श्रद्धापूर्वक इंदिरा एकादशी का व्रत रख सकते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी कारणों को ध्यान में रखते हुए गर्भवती महिलाओं, अतिवृद्ध बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को इस उपवास से विशेष छूट दी जाती है।
क्या बेटियां अपने पितरों के लिए रख सकती हैं इंदिरा एकादशी का व्रत
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या घर की बेटियां अपने दिवंगत माता-पिता या पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और व्रत कर सकती हैं? इस संबंध में गरुड़ पुराण और सनातन ग्रंथों में बहुत स्पष्ट विधान बताया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, घर की बेटियां भी अपने पितरों की आत्मा की शांति, मोक्ष और उनकी तृप्ति के लिए इंदिरा एकादशी के व्रत का पूरी निष्ठा के साथ पालन कर सकती हैं।
यदि किसी परिवार में कोई पुरुष संतान (पुत्र) नहीं है अथवा पुत्र अपने पितृ ऋण को चुकाने या श्राद्ध कर्म करने में असमर्थ है, तो ऐसी स्थिति में घर की बेटी को अपने पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और एकादशी का व्रत करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। आधुनिक समय में बेटियां हर मोर्चे पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रही हैं और पितृ पक्ष में उनका यह धार्मिक योगदान भी पूरी तरह फलदायी माना गया है।
इंदिरा एकादशी पर किस प्रकार के पितरों का होता है श्राद्ध
धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान आने वाली एकादशी तिथि पर मुख्य रूप से उन पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण संपन्न किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। इस विशेष श्राद्ध को 'एकादशी श्राद्ध' या 'ग्यारस श्राद्ध' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ-साथ पितरों का स्मरण करने से अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं को भी शांति मिलती है।
तर्पण और पूजा की सरल विधि
इंदिरा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद अपने घर के मंदिर में भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। पूजा के दौरान श्री हरि को पीले फूल, रोली, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार पितरों के निमित्त जल से तर्पण करें। इस पावन दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र और अपनी सामर्थ्यनुसार दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। पितृ पक्ष में कुतुप और रोहिणी मुहूर्त को श्राद्ध कर्म के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु का ध्यान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।