Fake Passport Case: पतंजलि के आचार्य बालकृष्ण को बड़ी राहत; फर्जी पासपोर्ट के 15 साल पुराने मामले में CBI कोर्ट ने किया बरी, जाने क्या था पूरा विवाद
पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और योग गुरु बाबा रामदेव के प्रमुख सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को 15 वर्ष पुराने हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद में बड़ी राहत मिली है। देहरादून स्थित विशेष सीबीआई अदालत (तृतीय अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी) ने कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के मामले में फैसला सुनाते हुए आचार्य बालकृष्ण और सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी को सभी आरोपों से दोषमुक्त करार दे दिया है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष (CBI) आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। अदालत के इस आदेश के साथ ही वर्ष 2011 से चली आ रही करीब डेढ़ दशक लंबी कानूनी लड़ाई का औपचारिक समापन हो गया है।
क्या था पूरा मामला? 2011 में दर्ज हुई थी सीबीआई की एफआईआर
यह पूरा प्रकरण वर्ष 2011 का है जब केंद्र सरकार के निर्देश पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक शिकायत के आधार पर प्रारंभिक जांच शुरू की थी। जुलाई 2011 में सीबीआई ने औपचारिक एफआईआर दर्ज कर आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 120-बी (आपराधिक साजिश), 468, 471 (फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल) और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत मुकदमा कायम किया था।
सीबीआई का आरोप था कि आचार्य बालकृष्ण ने बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय से भारतीय पासपोर्ट बनवाते समय जो शैक्षणिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए थे, वे संदिग्ध और जाली थे। जांच एजेंसी का दावा था कि बुलंदशहर (खुर्जा) स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संबंधित दिखाए गए ये दस्तावेज रिकॉर्ड में नहीं मिले। इसके साथ ही एजेंसी ने कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर नरेश चंद्र द्विवेदी पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने में सहयोग का आरोप लगाते हुए सह-अभियुक्त बनाया था।
जांच और अदालती कार्यवाही का सफर
एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच के दौरान जुलाई 2011 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी थी और उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा करने का निर्देश दिया था। इसके बाद 2012 में सीबीआई ने सक्षम अदालत में आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया।
अक्तूबर 2013 में मामले में आरोप तय किए गए और लंबी गवाही व जिरह की प्रक्रिया चली। इस दौरान कई वर्षों तक बालकृष्ण का पासपोर्ट अदालत की कस्टडी में रहा, जिसे बाद में 2018 में उच्च न्यायालय की अनुमति से नवीनीकरण के लिए वापस दिया गया था।
अदालत ने क्यों किया बरी? इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और गवाहों पर उठे सवाल
विशेष सीबीआई अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में रेखांकित किया कि मामले में पेश किए गए साक्ष्यों में कई गंभीर खामियां थीं:
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इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की अमान्यता: अदालत ने पाया कि सीबीआई द्वारा पेश की गई शैक्षणिक दस्तावेजों की स्कैन कॉपियां इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से जुड़े जरूरी कानूनी प्रावधानों के अनुरूप प्रमाणित नहीं थीं।
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हैंडराइटिंग रिपोर्ट में सीमाएं: केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) की लिखावट जांच रिपोर्ट में भी फोटोकॉपी पर तुलना की तकनीकी सीमाएं स्वीकार की गई थीं।
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गवाहों की विश्वसनीयता: अभियोजन पक्ष के कुछ गवाहों के बयानों में अंतर्विरोध पाए गए और महत्वपूर्ण गवाह मुकर गए, जिसके आधार पर कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए दोषमुक्त किया।
फैसले पर आचार्य बालकृष्ण और बाबा रामदेव की प्रतिक्रिया
अदालत से क्लीन चिट मिलने के बाद आचार्य बालकृष्ण ने इसे सत्य और न्यायपालिका पर भरोसे की जीत बताया। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि पिछले 15 वर्षों से एक झूठे मुकदमे के जरिए उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और छवि धूमिल करने का असफल प्रयास किया गया, लेकिन अंततः सत्य की विजय हुई।
वहीं, योग गुरु बाबा रामदेव ने भी फैसले का स्वागत करते हुए इसे ऐतिहासिक दिन बताया और कहा कि अदालत ने सभी झूठे आरोपों को खारिज कर न्याय स्थापित किया है।
| विवरण | मुख्य बिंदु |
| मामला | कथित फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों पर पासपोर्ट हासिल करने का आरोप |
| जांच एजेंसी | केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) |
| एफआईआर की तिथि | जुलाई 2011 |
| फैसले की अदालत | विशेष सीबीआई अदालत (3rd ACJM), देहरादून |
| अंतिम निर्णय | सभी आरोपों से बाइज्जत बरी (Acquitted) |