ग्रहों की चाल ने बदला 100 साल का कैलेंडर, हरिद्वार और नासिक में क्या एक ही समय डुबकी लगाएंगे भक्त?

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News India Live, Digital Desk: भारत में कुंभ मेला सिर्फ एक मेला नहीं है, यह करोड़ों लोगों की आस्था का वो सागर है जिसमें हर कोई अपनी पाप-पुण्य की डुबकी लगाना चाहता है। बचपन से हम यही सुनते आए हैं कि कुंभ मेला हर 12 साल बाद लौटकर आता है। यह एक ऐसा नियम था जिसे हम पत्थर की लकीर मानते थे। लेकिन, क्या हो अगर मैं आपसे कहूं कि 2027 में यह पुराना गणित गड़बड़ा सकता है?

जी हाँ, ज्योतिष के गलियारों और साधु-संतों की जमात में आजकल एक नई बहस छिड़ी हुई है। चर्चा यह है कि साल 2027 में एक ऐसा दुर्लभ संयोग (Rare Alignment) बन रहा है कि हरिद्वार और नासिक दोनों जगहों पर कुंभ का योग एक साथ या बहुत ही कम अंतर पर बन सकता है।

आइये, इस उलझन को ज्योतिष के भारी शब्दों के बजाय आसान भाषा में सुलझाते हैं।

यह कन्फ्यूजन क्यों पैदा हुआ?

असल में, कुंभ मेले की तारीखें कैलेंडर की तारीखों (1, 2, 3...) से नहीं, बल्कि ग्रहों की चाल (Planetary Movements) से तय होती हैं। इसमें सबसे बड़ा रोल 'देव गुरु बृहस्पति' (Jupiter) का होता है।

नियम यह कहता है कि जब गुरु ग्रह 'कुंभ राशि' (Aquarius) में आते हैं, तो हरिद्वार में कुंभ होता है और जब वो 'सिंह राशि' (Leo) में जाते हैं, तो नासिक में 'सिंहस्थ कुंभ' लगता है।

आमतौर पर एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में समय लगता है, जिससे मेलों में गैप बना रहता है। लेकिन 2027 में ग्रहों की चाल कुछ ऐसी हो रही है कि ज्योतिषीय गणनाएं एक ही साल में दो बड़े आयोजनों का संकेत दे रही हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे दो अलग-अलग ट्रेनें एक ही समय पर स्टेशन पर आ जाएं।

क्या पुराने नियम टूट गए?

ऐसा नहीं है कि नियम टूटे हैं, बल्कि कुदरत ने अपनी गति बदल दी है। जानकारों का कहना है कि खगोलीय गणनाओं (Astronomical Calculations) के मुताबिक, गुरु ग्रह का गोचर कुछ इस तरह हो रहा है कि नासिक के सिंहस्थ कुंभ और हरिद्वार के कुंभ का समय आपस में टकरा रहा है या बिल्कुल आसपास आ रहा है।

अगर ऐसा होता है, तो यह हम सबके जीवनकाल में देखने वाली एक ऐतिहासिक घटना होगी। इससे पहले 1938 या उससे भी पहले ऐसे संयोग की हल्की-फुल्की चर्चा हुई थी, लेकिन इतना स्पष्ट नहीं।

श्रद्धालु अब क्या करें?

अब सबसे बड़ा सवाल भक्तों के सामने है "हम कहाँ जाएं?" एक तरफ नासिक का गोदावरी तट है, तो दूसरी तरफ हरिद्वार की गंगा मैया।

फिलहाल, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और बड़े-बड़े विद्वान बैठकर पंचांग खंगाल रहे हैं। वे यह तय करेंगे कि स्नान की मुख्य तारीखें (Shahi Snan Dates) कैसे रखी जाएं ताकि भगदड़ न मचे और साधु-संत दोनों जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।

एक बात तो तय है, साल 2027 धर्म और ज्योतिष के इतिहास में दर्ज होने वाला है। यह उलझन नहीं, बल्कि भक्तों के लिए डबल बोनस हो सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिरी फैसला क्या आता है। तब तक, बस इतना मान कर चलिए कि ईश्वर हमें ज्यादा मौका दे रहे हैं आस्था के रंग में रंगने का!