मिडिल ईस्ट जंग की मार थमी प्लास्टिक फैक्ट्रियों की रफ्तार, कच्चे माल के संकट से मशीनों पर लगा 'ताला'
News India Live, Digital Desk: पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष का असर अब भारत के औद्योगिक गलियारों में साफ दिखने लगा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने न केवल कच्चे तेल की कीमतों में आग लगाई है, बल्कि भारत के प्लास्टिक उद्योग की कमर भी तोड़ दी है। सप्लाई चेन टूटने और कच्चे माल (पॉलिमर) की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के कारण देश भर की हजारों प्लास्टिक फैक्ट्रियों में सन्नाटा पसर गया है। कल तक चौबीसों घंटे चलने वाली मशीनें अब शांत हैं, और उद्योग जगत के सामने अनिश्चितता के काले बादल छा गए हैं।
कच्चे माल के दामों में 75% तक का उछाल
प्लास्टिक उद्योग पूरी तरह से पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भर है, जिसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। युद्ध के कारण समुद्री रास्तों, विशेषकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट ने माल की आवाजाही को बाधित कर दिया है। जानकारों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे माल यानी पॉलिमर की कीमतों में 60 से 75 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लागत इतनी अधिक बढ़ गई है कि फैक्ट्री मालिकों के लिए उत्पादन जारी रखना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
मजदूरों की रोजी-रोटी पर संकट, छंटनी की आशंका
फैक्ट्रियों में काम बंद होने का सबसे बुरा असर वहां काम करने वाले दिहाड़ी और कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों पर पड़ रहा है। ओडिशा के बालासोर से लेकर गुजरात के मोरबी तक, प्लास्टिक यूनिट्स में काम करने वाले श्रमिकों का कहना है कि उन्हें अब काम मिलना बंद हो गया है। एक महीने पहले जहां शिफ्ट में काम करने की फुर्सत नहीं मिलती थी, वहीं अब ज्यादातर मशीनें धूल फांक रही हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो इस सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी और बेरोजगारी का खतरा मंडरा रहा है।
छोटे उद्योगों पर सबसे ज्यादा मार, सरकारी हस्तक्षेप की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। बड़े उद्योगपतियों के पास तो कुछ समय का स्टॉक होता है, लेकिन छोटी इकाइयां रोज के कच्चे माल पर निर्भर रहती हैं। सप्लाई चेन टूटने से इन फैक्ट्रियों ने अस्थायी रूप से उत्पादन रोकने का फैसला किया है। उद्योग संघों ने सरकार से हस्तक्षेप करने और कच्चे माल की वैकल्पिक व्यवस्था करने की गुहार लगाई है, ताकि इस संकट से जूझ रहे लाखों परिवारों का चूल्हा जलता रहे।