Medical Students Crisis : कानपुर के 27% ग्रेजुएशन और 31% PG मेडिकल छात्र डिप्रेशन के शिकार सर्वे में हुआ बड़ा खुलासा
News India Live, Digital Desk: कानपुर के जीएसवीएम (GSVM) मेडिकल कॉलेज और अन्य संस्थानों के छात्रों पर किए गए एक हालिया सर्वे ने चिकित्सा जगत में चिंता पैदा कर दी है। आंकड़े बताते हैं कि डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे युवा खुद एक गंभीर मानसिक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इस सर्वे में एमबीबीएस (UG) और पोस्ट-ग्रेजुएशन (PG) दोनों स्तर के छात्रों को शामिल किया गया था।
सर्वे के मुख्य आंकड़े (Shocking Stats)
सर्वेक्षण के परिणामों ने छात्रों की मानसिक स्थिति की एक डरावनी तस्वीर पेश की है:
UG छात्र (MBBS): स्नातक स्तर के लगभग 27% छात्र मध्यम से गंभीर डिप्रेशन के लक्षणों का सामना कर रहे हैं।
PG छात्र (MD/MS): पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहे 31% छात्र अवसाद के शिकार पाए गए हैं।
तुलना: पीजी छात्रों में अवसाद की दर अधिक पाई गई, जिसका मुख्य कारण काम का अत्यधिक बोझ और भविष्य की चिंता बताया जा रहा है।
तनाव के 5 बड़े कारण (Reasons for Stress)
विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों ने इस स्थिति के लिए कुछ प्रमुख कारकों को जिम्मेदार ठहराया है:
काम के घंटों का दबाव: पीजी छात्रों को अक्सर 24 से 36 घंटे की शिफ्ट करनी पड़ती है, जिससे नींद की कमी और शारीरिक थकान होती है।
करियर और कॉम्पिटिशन: मेडिकल के कठिन पाठ्यक्रम और स्पेशलाइजेशन के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा मानसिक दबाव पैदा करती है।
मरीजों और तीमारदारों का व्यवहार: अस्पतालों में बढ़ती भीड़ और कई बार तीमारदारों द्वारा की जाने वाली बदसलूकी से छात्र असुरक्षित महसूस करते हैं।
सामाजिक अलगाव: पढ़ाई और ड्यूटी के चलते छात्र अपने परिवार और दोस्तों को समय नहीं दे पाते, जिससे वे अकेलापन महसूस करने लगते हैं।
बुलिंग और रैगिंग: हालांकि कड़े नियम हैं, लेकिन कुछ मामलों में सीनियर-जूनियर के बीच तनावपूर्ण संबंध भी मानसिक दबाव का कारण बनते हैं।
उपाय और सुझाव
सर्वे रिपोर्ट में छात्रों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ सुझाव भी दिए गए हैं:
मेडिकल कॉलेजों में नियमित काउंसलिंग सेशन अनिवार्य किए जाएं।
डॉक्टरों के काम के घंटों को सुव्यवस्थित (Streamlined) किया जाए ताकि उन्हें पर्याप्त आराम मिल सके।
परिसरों में खेल-कूद और मनोरंजन की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए।