जन्मदिन पर मायावती का सियासी धमाका ,ब्राह्मण खुश और यादवों को भी मिला खास तोहफा

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News India Live, Digital Desk: आज 15 जनवरी है यानी बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती का जन्मदिन। लखनऊ में नीले झंडों और केक की चर्चा तो है ही, लेकिन इससे ज्यादा चर्चा उस 'नए फार्मूले' की हो रही है जो आज 'बहन जी' ने पेश किया है।

सियासत में कहा जाता है कि मायावती जब चुप रहती हैं तो कुछ बड़ा सोच रही होती हैं। आज अपने जन्मदिन के मौके पर उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी और कुछ ऐसा कर दिया जिससे यूपी की राजनीति में नई खलबली मच सकती है।

ब्राह्मणों की सुनी गई, क्षत्रियों को भी साधा

लंबे समय से चर्चा थी कि बीएसपी अपने पुराने 'सोशल इंजीनियरिंग' वाले जादुई फॉर्मूले (दलित + ब्राह्मण) पर लौटना चाहती है। आज मायावती के फैसलों में इसकी साफ झलक दिखी। खबरों की मानें तो मायावती ने संगठन और आगामी जिम्मेदारियों में ब्राह्मण समाज की "मुरादें पूरी" कर दी हैं। उन्हें पार्टी में बड़ा सम्मान और जगह दी गई है।

लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट कहीं और है।

सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, इस बार मायावती ने क्षत्रिय (ठाकुर) और यादव समाज पर भी डोरे डाले हैं। जी हाँ, यादव! जो आमतौर पर समाजवादी पार्टी (SP) का कोर वोट बैंक माने जाते हैं। मायावती का यह कदम बताता है कि वो अब पुरानी लकीर पीटने के बजाय, हर उस वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती हैं जो उनसे नाराज है या नया विकल्प तलाश रहा है।

क्यों खेला यादव और ठाकुर कार्ड?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती समझ चुकी हैं कि सिर्फ 'दलित-मुस्लिम' समीकरण के भरोसे सत्ता में लौटना मुश्किल है। इसीलिए उन्होंने "सर्वजन हिताय" की अपनी पुरानी किताब के पन्ने फिर से खोल दिए हैं।

  1. ब्राह्मणों को रिझाना: बीजेपी से नाराज चल रहे ब्राह्मण वोटर्स को अपने पाले में लाना।
  2. यादवों को मौका देना: सपा के गढ़ में घुसकर यह संदेश देना कि बीएसपी में भी उनका स्वागत है, ताकि विरोधी खेमे में बेचैनी बढ़े।

कार्यकर्ताओं को दिया कड़ा संदेश

अपने जन्मदिन के मौके पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी अब "गठबंधन" के बैसाखी पर नहीं चलेगी, बल्कि अपने दम पर खड़ी होगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि जातिगत भेदभाव छोड़कर सभी समाजों (सर्व समाज) को जोड़ने का काम करें।

क्या यह मास्टरस्ट्रोक साबित होगा?

चुनाव दर चुनाव कमजोर होती बीएसपी के लिए यह एक 'करो या मरो' वाली स्थिति है। जन्मदिन के जश्न के बीच यह नया सियासी दांव कितना काम आता है, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि मायावती ने अपने विरोधियों को सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है कि कहीं 2007 वाला इतिहास दोहराने की तैयारी तो नहीं?