Anti-Sikh Riots case : क्या 40 साल बाद भी अधूरा है 1984 का इंसाफ? सज्जन कुमार के बरी होने पर उठे कई गहरे सवाल
News India Live, Digital Desk: 1984 के वो काले दिन भारत के इतिहास में कभी न भरने वाले जख्म की तरह हैं। सिखों के खिलाफ हुई उस हिंसा के चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उस दौर से जुड़ा कोई फैसला आता है, तो वे पुराने दर्द फिर से ताज़ा हो जाते हैं। ताज़ा खबर ये है कि कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार को 1984 दंगों के एक और मामले में कोर्ट ने बरी कर दिया है।
पूरा माजरा क्या है?
दिल्ली की एक अदालत ने सुल्तानपुरी इलाके में हुई हिंसा के एक मामले में सज्जन कुमार को राहत दी है। दरअसल, सालों से चले आ रहे इस केस में पर्याप्त सबूतों की कमी या गवाहों के बयानों में अंतर को देखते हुए कोर्ट ने उन्हें बरी करने का फैसला सुनाया। ज़ाहिर है, जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया है, उनके लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। न्याय की तलाश में दर-दर भटकती उन बूढ़ी आँखों के लिए 40 साल का इंतज़ार बहुत लंबा होता है।
क्या सज्जन कुमार अब जेल से बाहर आ जाएंगे?
बहुत से लोग यह सोच रहे होंगे कि इस फैसले के बाद सज्जन कुमार आज़ाद हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। भले ही इस 'एक' केस में वे बरी हुए हैं, पर साल 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दंगे के एक दूसरे मामले में 'दोषी' करार दिया था और तब से वे उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। यानी यह फैसला सिर्फ इस विशिष्ट केस के लिए है, जेल की कोठरी फिलहाल उनके पीछे नहीं हटने वाली।
सुलगते सवाल और भावनाओं का समंदर
अक्सर जब दंगों जैसे संवेदनशील मामलों में फ़ैसले आते हैं, तो सवाल उठना लाज़मी है। क्या सबूतों का मिट जाना या वक्त का गुजर जाना गुनहगारों के लिए ढाल बन रहा है? पीड़ितों का आज भी मानना है कि कई ताकतवर लोग आज भी सजा की पहुँच से बाहर हैं। कोर्ट अपनी जगह कानून के आधार पर काम करती है, लेकिन उन गलियों और उन मोहल्लों में जहाँ कत्लेआम हुआ था, आज भी इंसाफ की आस दम तोड़ रही है।
सच तो ये है कि जब किसी समुदाय की पूरी पीढ़ी एक त्रासदी का दर्द झेलती है, तो एक अदालती फैसला भले ही किसी को बरी कर दे, लेकिन इतिहास के पन्नों में जो दर्ज है, वह नहीं मिट सकता। इस फैसले ने एक बार फिर से उन पीड़ितों की यादों को कुरेद दिया है जो आज भी अपने दरवाज़े की तरफ ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन न्याय की असली जीत होगी।