Mani Mahesh Yatra : क्या रूठ गए हैं मणिमहेश? 115 साल में पहली बार दिखा प्रकृति का ऐसा भयानक रूप

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News India Live, Digital Desk: Mani Mahesh Yatra : आस्था और प्रकृति का एक अनूठा संगम है मणिमहेश यात्रा, जहां हर साल लाखों भक्त कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव के दर्शनों के लिए कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं। लेकिन इस साल जो हो रहा है, उसे देखकर पुराने लोग भी सिहर उठते हैं। उनका एक ही सवाल है - क्या भोलेनाथ हमसे रूठे हुए हैं?

वजह है प्रकृति का वो भयानक रूप जो पिछले 115 सालों में किसी ने नहीं देखा। इस साल की यात्रा आपदाओं की एक ऐसी श्रृंखला लेकर आई है, जिसने न केवल यात्रा को रोक दिया, बल्कि आस्था की जड़ों को भी हिलाकर रख दिया है।

115 साल की अटूट परंपरा कैसे टूटी?

मणिमहेश यात्रा का इतिहास सदियों पुराना है, लेकिन पिछले 115 सालों से यह परंपरा कभी नहीं रुकी थी। हर साल जन्माष्टमी के मौके पर 'छड़ी यात्रा' चंबा के दशनाम अखाड़े से शुरू होती थी और राधाष्टमी के पवित्र स्नान के साथ संपन्न होती थी। चाहे जैसी भी परिस्थितियां रहीं हों, यह यात्रा कभी नहीं थमी।

लेकिन इस साल, कुदरत का कहर कुछ ऐसा बरसा कि सब कुछ थम गया। यात्रा शुरू होने से ठीक पहले और यात्रा के दौरान भी भारी बारिश, भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ ने पूरे रास्ते को तहस-नहस कर दिया। भरमौर से लेकर मणिमहेश डल झील तक का रास्ता कई जगहों पर पूरी तरह टूट गया। पुल बह गए और रास्ते किसी नदी में तब्दील हो गए।

आस्था या प्रकृति का प्रकोप?

हालात इतने खराब हो गए कि प्रशासन को इतिहास में पहली बार यात्रा को आधिकारिक तौर पर स्थगित करने का कठिन फैसला लेना पड़ा। कई श्रद्धालु रास्ते में ही फंस गए, जिन्हें बड़ी मुश्किलों से बाहर निकाला गया।

स्थानीय बुजुर्ग और भक्त इसे सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं मान रहे हैं। उनका मानना है कि यह भगवान मणिमहेश की नाराजगी का संकेत है। वे कहते हैं कि पहाड़ों में बढ़ता मानवीय दखल, गंदगी और भक्ति के नाम पर होता शोर-शराबा शायद भोलेनाथ को पसंद नहीं आ रहा है। उनका शांत स्वभाव जब रौद्र रूप लेता है, तो प्रकृति इसी तरह संकेत देती है।

हालांकि वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन और असामान्य मॉनसून का नतीजा बता रहे हैं, लेकिन जिन लोगों की आस्था इन पहाड़ों और वादियों से जुड़ी है, उनके लिए यह एक सीधा संदेश है। यह तबाही उन्हें सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं भक्ति के जोश में वे प्रकृति के सम्मान की रेखा तो नहीं लांघ रहे? फिलहाल, टूटे रास्तों और उदास चेहरों के बीच हर किसी को बस यही उम्मीद है कि भोलेनाथ शांत हों और अगले साल अपनी कृपा फिर से बरसाएं।