मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज बनेंगे विश्व धरोहर? भारत ने यूनेस्को को भेजा नामांकन, जानें क्यों खास हैं ये प्राकृतिक पुल

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News India Live, Digital Desk : भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के नाम आज एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई है। मेघालय की पहचान बन चुके सदियों पुराने 'लिविंग रूट ब्रिज' (Living Root Bridges) अब यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की दहलीज पर हैं। भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर 2026-27 चक्र के लिए अपना नामांकन डोजियर यूनेस्को को सौंप दिया है। यह कदम न केवल इन अद्भुत संरचनाओं को वैश्विक पहचान दिलाएगा, बल्कि मेघालय में ईको-टूरिज्म के नए द्वार भी खोलेगा।

जिंगकिएंग जरी: सदियों पुरानी स्वदेशी 'बायो-इंजीनियरिंग' का नमूना

मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियों के बीच बसे ये पुल, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'जिंगकिएंग जरी' या 'ल्यू चराई' कहा जाता है, मानव और प्रकृति के बीच गहरे सामंजस्य का प्रतीक हैं। ये पुल ईंट या कंक्रीट से नहीं, बल्कि जीवित पेड़ों की जड़ों से बने हैं।

खासी और जयंतिया समुदाय के लोग सदियों से रबर के पेड़ों (Ficus elastica) की हवाई जड़ों को नदियों और झरनों के पार बढ़ने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। धीरे-धीरे इन्हें आपस में गूंथ दिया जाता है, जिससे एक बेहद मजबूत पुल तैयार होता है।

क्यों खास हैं ये पुल? आधुनिक इंजीनियरिंग भी है इनके आगे फेल

अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ये पुल केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि टिकाऊ विकास (Sustainability) का सबसे बड़ा उदाहरण हैं:

बिना सीमेंट-सरिया के मजबूती: इन पुलों के निर्माण में कंक्रीट या लोहे का इस्तेमाल नहीं होता। हैरानी की बात यह है कि ये समय के साथ कमजोर होने के बजाय जड़ों की वृद्धि के साथ और अधिक मजबूत होते जाते हैं।

बाढ़ में भी अडिग: मेघालय जैसे अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र में, जहां आधुनिक पुल अक्सर मानसून की भेंट चढ़ जाते हैं, ये 'जीवित पुल' सदियों तक टिके रहते हैं।

पारंपरिक ज्ञान: जड़ों को बुनने और उन्हें दिशा देने की यह कला किसी इंजीनियरिंग स्कूल से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्वदेशी परंपरा से आती है।

पेरिस में सौंपा गया नामांकन डोजियर: 'लिविंग कल्चरल लैंडस्केप' की पहचान

29 जनवरी 2026 को भारत ने आधिकारिक तौर पर पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में अपना डोजियर जमा किया। इस रिपोर्ट में इन पुलों को “लिविंग कल्चरल लैंडस्केप” (जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य) के रूप में पेश किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यूनेस्को इस नामांकन पर मुहर लगाता है, तो मेघालय दुनिया के उन चुनिंदा स्थानों में शामिल हो जाएगा जहां प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व को वैश्विक सम्मान मिला है। इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि मेघालय की परंपराओं को वैश्विक मंच पर एक नई गरिमा मिलेगी।

पर्यावरण और संस्कृति का अनूठा संगम

ये संरचनाएं उस समय से 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ हैं, जब यह शब्द आधुनिक दुनिया के लिए अनजाना था। ये पुल न केवल परिवहन का साधन हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा करते हैं। यूनेस्को की सूची में शामिल होने से इन नाजुक धरोहरों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय फंड और तकनीकी सहायता मिलने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।