जज केवल रोबोट नहीं होते इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी संवेदनहीनता बर्दाश्त नहीं

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News India Live, Digital Desk : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए जजों के लिए 'संवेदनशीलता' का पाठ पढ़ाया है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने एक कैंसर पीड़ित कर्मचारी से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून की व्याख्या करते समय मानवीय पहलू को नजरअंदाज करना न्याय की भावना के खिलाफ है।

क्या था मामला? (इलाहाबाद हाई कोर्ट की 'कठोर' व्याख्या)

यह मामला एक उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारी से जुड़ा था, जो गंभीर बीमारी (कैंसर) से जूझ रहा था। बीमारी के कारण वह लंबे समय तक ड्यूटी पर नहीं आ सका। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तकनीकी आधार पर उसकी अनुपस्थिति को 'अवैध' मानते हुए उसे राहत देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने नियमों की इतनी कड़ी व्याख्या की थी कि कर्मचारी की जानलेवा बीमारी को भी अनदेखा कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट की 'सहानुभूति' वाली नसीहत

शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के रुख पर नाराजगी जताते हुए कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:

कानून बनाम मानवता: कोर्ट ने कहा कि जजों को केवल 'मैकेनिकल' (यांत्रिक) तरीके से काम नहीं करना चाहिए। नियमों के पीछे छिपी मानवीय स्थिति को समझना जरूरी है।

संवेदना की कमी: पीठ ने टिप्पणी की, "न्याय केवल काले और सफेद अक्षरों में नहीं होता। एक जज के पास समाज और पीड़ित के प्रति सहानुभूति होनी चाहिए।"

कैंसर और मजबूरी: कोर्ट ने माना कि एक व्यक्ति जो कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहा है, उससे यह उम्मीद करना कि वह हर कानूनी औपचारिकता पूरी करे, अनुचित है।

न्यायपालिका के लिए बड़ा संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन सभी निचली अदालतों के लिए एक नजीर है जो अक्सर तकनीकी खामियों के आधार पर बड़े मानवीय संकटों को खारिज कर देती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय का अंतिम लक्ष्य 'राहत पहुँचाना' है, न कि केवल नियमों का जाल बुनना।