झारखंड की योजनाएं और फाइलों का सफर कैंप में उमड़ी भीड़
News India Live, Digital Desk : याद कीजिए वो दौर, जब किसी पेंशन स्कीम का स्टेटस जानना हो या राशन कार्ड में नाम जुड़वाना हो, तो प्रखंड मुख्यालय (ब्लॉक) के चक्कर काटते-काटते महीने बीत जाते थे। झारखंड के ग्रामीण इलाकों में इसी दूरी को कम करने के लिए "आपकी योजना, आपकी सरकार, आपके द्वार" जैसा महत्वाकांक्षी कार्यक्रम चलाया गया। आज 30 दिसंबर 2025 है और चर्चा का विषय यह है कि गिरिडीह, रांची और अन्य जिलों में जो आवेदन लिए गए थे, उनका निपटारा आखिर किस रफ्तार से हो रहा है।
कैंपों में उमड़ती उम्मीदों का सैलाब
जब ये कैंप पंचायतों में लगते हैं, तो नज़ारा देखने वाला होता है। कोई अबुआ आवास की उम्मीद लेकर आता है, तो कोई सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना की। रांची और गिरिडीह जैसे जिलों से आई ताज़ा रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन कैंपों में हजारों की संख्या में आवेदन जमा हुए हैं। अच्छी बात यह है कि प्रशासन अब फाइलों को दबाने के बजाय उन्हें डिजिटली ट्रैक कर रहा है, जिससे आवेदकों को पोर्टल पर अपनी स्थिति देखने की सुविधा मिली है।
गिरिडीह और रांची: कागजों पर काम या धरातल पर समाधान?
गिरिडीह जिले में हालिया डेटा बताता है कि वहां के विभिन्न प्रखंडों में शिकायतों के निपटारे की दर काफी बेहतर रही है। वहीं राजधानी रांची के आसपास के शिविरों में भी अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि छोटी-मोटी समस्याओं को कैंप में ही हल कर दिया जाए। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी वृद्ध का आधार लिंक न होने से पेंशन रुकी है, तो कोशिश यही रहती है कि वहां बैठा कर्मी तुरंत उसका समाधान करे।
लेकिन, कुछ आवेदनों जैसे 'नया घर' (Awas) या बड़े निर्माण कार्यों के लिए लंबी प्रक्रिया होती है, जिनमें थोड़ा समय लग रहा है। यही वजह है कि कुछ लोग पोर्टल पर 'लंबित' (Pending) स्टेटस देखकर थोड़े निराश भी होते हैं, लेकिन प्रशासन का दावा है कि कोई भी जेन्युइन आवेदन खारिज नहीं किया जाएगा।
आम जनता के मन की बात
अगर आप इन कैंपों में जाकर किसी किसान या ग्रामीण महिला से बात करेंगे, तो वो यही कहेगा कि— "कम से कम अधिकारी हमारे दरवाजे पर तो आ रहे हैं।" दूरी और डर, जो आम लोगों को सरकारी अधिकारियों से मिलने में झिझक पैदा करता था, वो इस पहल से काफी हद तक कम हुआ है।
निष्कर्ष (संक्षिप्त सुझाव के रूप में)
हालांकि लाखों आवेदन निपटा दिए गए हैं, लेकिन चुनौती अभी उन 'जटिल' मामलों को सुलझाने की है जिनमें तकनीकी कमियों की वजह से काम फंसा हुआ है। 2026 में कदम रखने से पहले अगर सरकार इन पेंडिंग फाइलों को और तेज़ी से क्लीयर कर दे, तो यह अभियान सही मायनों में 'मजदूरों और गरीबों का मददगार' कहलाएगा।