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April 05 2026 07:45 pm

चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं हों पूरी तरह स्वतंत्र, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना का बड़ा बयान

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News India Live, Digital Desk: भारतीय लोकतंत्र के भविष्य और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं को पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना के अनुसार, अगर चुनाव कराने वाली संस्थाएं चुनाव लड़ने वालों पर ही निर्भर होंगी, तो पूरी प्रक्रिया की तटस्थता और निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छिड़ी हुई है।

संविधान की मजबूती के लिए 'स्वतंत्रता' अनिवार्य

पटना में आयोजित 'प्रथम डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने 'संवैधानिक अधिकार और संरचना' विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग, कैग (CAG) और वित्त आयोग जैसी संस्थाओं का निर्माण एक विशेष उद्देश्य के साथ किया गया है। इन संस्थाओं को सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाओं से अलग और सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग का कार्य केवल समय-समय पर चुनाव कराना ही नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की अखंडता को बनाए रखना है, जिससे सत्ता का गठन होता है।

'टीएन शेषन बनाम भारत संघ' केस का दिया हवाला

अपने संबोधन में जस्टिस नागरत्ना ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'टीएन शेषन' मामले का जिक्र करते हुए बताया कि कोर्ट ने पहले ही चुनाव आयोग को उच्च महत्व वाला संवैधानिक प्राधिकरण माना है। उन्होंने कहा, "संरचनात्मक रूप से यदि चुनाव संचालक ही प्रतियोगियों (नेताओं) के अधीन होंगे, तो प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।" जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इन संस्थाओं का किसी भी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहना अनिवार्य है।

अकेले अधिकारों से नहीं, 'संरचना' से चलता है देश

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अक्सर हम केवल नागरिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि उन अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संवैधानिक संरचना (Structure) का होना कितना जरूरी है। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक निकाय हमारे लोकतंत्र के पहरेदार हैं। यदि ये पहरेदार स्वतंत्र नहीं होंगे, तो सत्ता का परिवर्तन और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पारदर्शी नहीं रह जाएगी। उनके इस बयान को भविष्य के संस्थागत सुधारों की दिशा में एक बड़े मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है।