आसमान में भी खुल गया स्वदेशी फ्यूल स्टेशन, ISRO की इस तकनीक को देख पूरी दुनिया रह गई दंग
News India Live, Digital Desk: अगर आपकी गाड़ी का पेट्रोल बीच रास्ते में खत्म हो जाए और वहां कोई पेट्रोल पंप न हो, तो क्या होगा? ज़ाहिर है, गाड़ी वहीं खड़ी रह जाएगी। अंतरिक्ष में भी अब तक ऐसा ही होता आया है। करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से बने सैटेलाइट जब अपना काम कर रहे होते हैं और उनका फ्यूल (ईंधन) खत्म हो जाता है, तो वो काम करना बंद कर देते हैं और 'स्पेस जंक' यानी कचरा बन जाते हैं।
लेकिन हमारे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अब इसका तोड़ निकाल लिया है। भारत बहुत जल्द अंतरिक्ष में ही सैटेलाइट्स को रिफ्यूल करने (फिर से तेल भरने) की तकनीक का प्रदर्शन करने वाला है।
क्या है यह नई तकनीक?
सरल भाषा में कहें तो इसरो 'स्पैडेक्स' (SPADEX - Space Docking Experiment) नाम का एक मिशन तैयार कर रहा है। इसमें दो सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में एक-दूसरे से जोड़ा जाएगा। एक सैटेलाइट दूसरे में ईंधन भरने का काम करेगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक हवाई जहाज से दूसरे हवाई जहाज में उड़ते हुए ही तेल भर दिया जाता है।
इससे फायदा क्या होगा?
अभी तक की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि सैटेलाइट का सारा हिस्सा बिल्कुल सही होने के बावजूद, सिर्फ ईंधन की कमी की वजह से उसे बेकार मान लिया जाता था। इस नई तकनीक से:
- बचेंगे करोड़ों रुपये: सैटेलाइट की उम्र कई साल बढ़ जाएगी, जिससे बार-बार नए सैटेलाइट भेजने का खर्च बचेगा।
- कचरा कम होगा: अंतरिक्ष में बेकार पड़े उपग्रहों की भीड़ कम होगी।
- अपना स्पेस स्टेशन: भारत जो अपना 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' बनाने की योजना बना रहा है, उसके लिए यह तकनीक रीढ़ की हड्डी साबित होगी। बिना डॉकिंग और रिफ्यूलिंग के कोई भी स्पेस स्टेशन कामयाब नहीं हो सकता।
हम दुनिया से कितना आगे हैं?
दुनिया में अभी बहुत कम ऐसे देश हैं जिन्होंने अंतरिक्ष में रिफ्यूलिंग और सर्विसिंग की हिम्मत जुटाई है। इसरो के वैज्ञानिकों का मानना है कि हम इस तकनीक को सफल बनाने के बेहद करीब हैं। यह सिर्फ तेल भरने जैसा नहीं है, बल्कि दो तेज़ रफ़्तार से घूम रही चीज़ों को अंतरिक्ष की गहराई में एक-दूसरे से जोड़ना एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है, जिसे इसरो पार करने को तैयार है।
भविष्य की तस्वीर
यह कामयाबी भारत के लिए अंतरिक्ष में 'रिपेयरिंग की दुकान' खोलने जैसा है। भविष्य में अगर हमारे किसी उपग्रह में कोई खराबी आती है या उसका ईंधन कम होता है, तो हमें उसे छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हम बस एक 'रिफ्यूलर' भेजेंगे और हमारा सैटेलाइट फिर से ज़िंदा हो जाएगा।
इसरो की यह ज़िद और काबिलियत बताती है कि आने वाले सालों में अंतरिक्ष की रेस में भारत सिर्फ शामिल नहीं होगा, बल्कि उसे लीड करेगा।