राजनीति में आने से पहले पढ़ लें ये नियम, पूर्व नेवी चीफ को मिले नोटिस से मिली बड़ी चेतावनी

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News India Live, Digital Desk: भारत में चुनाव का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं होता, बल्कि नियमों का एक बहुत बड़ा जाल होता है जिससे बड़े से बड़े दिग्गज भी नहीं बच सकते। ताजा मामला है भारतीय नौसेना के एक पूर्व प्रमुख को मिले चुनाव आयोग (ECI) के नोटिस का। अब आप सोच रहे होंगे कि देश की रक्षा करने वाले इतने बड़े अधिकारी को भला चुनाव आयोग से नोटिस क्यों मिल गया?

चलिए, इसे थोड़ा आसान भाषा में समझते हैं।

नोटिस की असली वजह क्या है?
दरअसल, यह पूरा मामला 'आचार संहिता' (Model Code of Conduct) और कुछ प्रोटोकॉल से जुड़ा है। भारत में चुनाव आयोग का एक बहुत पुराना और सख्त नियम है कि सेना की वर्दी, सैन्य अधिकारियों की फोटो या सैन्य अभियानों का इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब कोई पूर्व सैन्य अधिकारी राजनीति के मैदान में उतरता है या किसी दल के समर्थन में कोई गतिविधि करता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि वो सेना की गरिमा और उसके गैर-राजनीतिक होने के चरित्र को नुकसान न पहुंचाए। यहाँ मामला सेना की फोटो या नाम के गलत इस्तेमाल से जुड़ा बताया जा रहा है।

ये SIR नोटिस क्या होता है?
कई बार लोग सोशल मीडिया पर 'SIR' शब्द का जिक्र करते देख कन्फ्यूज हो जाते हैं। आसान भाषा में कहें तो यह एक आधिकारिक नोटिस होता है, जिसमें चुनाव आयोग आपसे सफाई मांगता है। यह 'शोकॉज नोटिस' की तरह होता है—मतलब 'बताओ कि आप पर कार्रवाई क्यों न की जाए?' जब आयोग को लगता है कि पहली नज़र में नियम टूटे हैं, तब वो इसे भेजता है।

नोटिस मिलने पर अब आगे क्या होगा?
अगर किसी को चुनाव आयोग का ऐसा कोई नोटिस मिलता है, तो उनके पास कुछ तय विकल्प होते हैं:

  1. सफाई देना: व्यक्ति को तय समय के भीतर लिखित में जवाब देना होता है कि उनका इरादा नियमों को तोड़ना नहीं था।
  2. गलती मानना: अगर गलती से कोई भूल हो गई है, तो माफी मांगनी पड़ती है और विवादित सामग्री (जैसे पोस्ट या फोटो) को हटाना होता है।
  3. साक्ष्य पेश करना: अगर उन्हें लगता है कि उन पर लगाए गए आरोप गलत हैं, तो वे अपनी बेगुनाही के सबूत भी दे सकते हैं।

हम सबके लिए इसमें क्या सीख है?
यह खबर हमें याद दिलाती है कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा कितना मजबूत है। चुनाव के वक्त आयोग सबसे ऊपर होता है और उसके लिए कोई 'रिटायर्ड चीफ' हो या कोई 'बड़ा नेता', नियम सबके लिए बराबर हैं। यह सेना जैसे संस्थाओं को राजनीति से दूर रखने की एक जरूरी कोशिश भी है।

आज के सोशल मीडिया के दौर में, जब एक पोस्ट पूरी हवा बदल सकती है, वहां चुनाव आयोग की ऐसी सतर्कता बहुत जरूरी हो जाती है। अब देखना ये है कि पूर्व नेवी चीफ अपनी सफाई में क्या कहते हैं और आयोग उसे किस तरह देखता है।