सिर्फ कहने से नहीं बनेगा आत्मनिर्भर भारत ,CEA ने बताया आखिर हमें क्यों है तुरंत स्वदेशी की जरूरत?

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News India Live, Digital Desk: अक्सर हम सुनते हैं कि "अपना देश आगे बढ़ रहा है", लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे यहाँ चलने वाली कई मशीनें, तकनीक और यहाँ तक कि छोटे-छोटे कलपुर्जे अब भी विदेशों से आते हैं? इसी निर्भरता को लेकर मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने आगाह किया है।

मामला क्या है?
नागेश्वरन का कहना है कि आज की दुनिया बहुत अनिश्चित हो गई है। कहीं युद्ध चल रहा है, तो कहीं ट्रेड वॉर (Trade War) छिड़ा है। ऐसे में अगर हम अपने देश की जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहेंगे, तो जैसे ही दुनिया में कुछ गड़बड़ होगी, उसकी सीधी चोट हमारी जेब और हमारी जीडीपी (GDP) पर पड़ेगी। इसलिए 'इंडिजेनाइजेशन' यानी स्वदेशीकरण (Indigenisation) की अब "अर्जेंट" यानी तुरंत जरूरत है।

सिर्फ नारे से काम नहीं चलेगा
अब तक 'आत्मनिर्भर भारत' या 'मेक इन इंडिया' एक अभियान की तरह चल रहे थे। लेकिन नागेश्वरन ने साफ किया कि यह अब महज एक सरकारी नारा नहीं होना चाहिए। हमें टेक्नोलॉजी, दवाओं के रॉ-मटेरियल, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस सेक्टर में अपनी खुद की तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को तेजी से खड़ा करना होगा।

इसका आम इंसान पर क्या असर होगा?
सोचिए, अगर भारत में बनी चीजों का इस्तेमाल बढ़ता है और कलपुर्जे यहीं बनते हैं, तो दो बड़े फायदे होंगे। पहला— डॉलर की कीमतों में होने वाले बदलावों से हमारे सामान के दाम बार-बार नहीं बढ़ेंगे। दूसरा— देश के युवाओं के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरी के ढेर सारे नए मौके पैदा होंगे।

निष्कर्ष: समय हाथ से निकल न जाए!
नागेश्वरन का यह इशारा उन कंपनियों के लिए भी है जो शॉर्टकट में विदेश से माल मंगाकर यहाँ लेबल लगाकर बेचती हैं। अब असल मायने में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर निवेश करने का समय आ गया है।

लम्बी बात को छोटी में कहें, तो अगर भारत को सचमुच 'विकसित देश' बनना है, तो हमारी मशीनों और हमारी तकनीक के पीछे भारतीय दिमाग और भारतीय मेहनत का होना अब अनिवार्य हो गया है। हमें आज वह बोना होगा जिसकी फसल हम आने वाले कल में सुरक्षित तरीके से काट सकें।