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March 13 2026 09:47 am

India-Canada Reset : मार्क कार्नी की भारत यात्रा से पिघलेगी रिश्तों की बर्फ? व्यापार, AI और खालिस्तान पर आर-पार की बात

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News India Live, Digital Desk: भारत और कनाडा के बीच लंबे समय से चली आ रही कूटनीतिक कड़वाहट के बीच एक बड़ी और सकारात्मक हलचल देखने को मिल रही है। कनाडा के नवनियुक्त प्रधानमंत्री मार्क कार्नी (Mark Carney) जल्द ही भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण हो चुके रिश्तों को 'रीसेट' (Reset) करने के एक आखिरी और निर्णायक मौके के रूप में देखा जा रहा है।

रिश्तों में 'रीसेट' की कोशिश: क्यों अहम है यह दौरा?

पिछले कुछ वर्षों में निज्जर विवाद और खालिस्तानी चरमपंथ के मुद्दों ने भारत-कनाडा संबंधों को अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। मार्क कार्नी की इस पहली भारत यात्रा के केंद्र में तीन प्रमुख स्तंभ हैं:

1. व्यापार और आर्थिक संबंध (Trade Ties): कनाडा और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार की अपार संभावनाएं हैं। कार्नी, जो खुद एक अनुभवी अर्थशास्त्री और बैंकर रहे हैं, का मुख्य फोकस ठंडे बस्ते में पड़े Early Progress Trade Agreement (EPTA) को फिर से पटरी पर लाना है। कनाडाई पेंशन फंड्स का भारत में भारी निवेश है, जिसे वे सुरक्षित और विस्तारित करना चाहते हैं।

2. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक्नोलॉजी: कनाडा एआई रिसर्च में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है। कार्नी भारत के विशाल टैलेंट पूल और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर एआई सेक्टर में एक रणनीतिक साझेदारी की नींव रखना चाहते हैं।

3. खालिस्तान और सुरक्षा का पेचीदा मुद्दा: यह यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाएगी जब तक कि भारत की सुरक्षा चिंताओं का समाधान न हो। भारत सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि कनाडा की धरती से संचालित होने वाली भारत विरोधी गतिविधियां और खालिस्तानी चरमपंथ रिश्तों में सबसे बड़ी बाधा है। उम्मीद है कि कार्नी इस बार भारत को कोई ठोस भरोसा दे सकते हैं।

कनाडा की बदली हुई राजनीति का संकेत?

मार्क कार्नी का प्रधानमंत्री बनना खुद में एक संकेत है कि कनाडा अब "डिप्लोमेसी और इकोनॉमी" को प्राथमिकता देना चाहता है। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान जो गतिरोध पैदा हुआ था, कार्नी उसे बातचीत के जरिए सुलझाने के पक्षधर नजर आ रहे हैं।

विशेषज्ञों की राय: कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत अब एक वैश्विक शक्ति है और कनाडा अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए भारत जैसे बड़े बाजार को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकता।

चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं

भले ही कार्नी हाथ मिलाने को तैयार हों, लेकिन भारत के लिए 'सॉवरेन्टी' (संप्रभुता) सर्वोपरि है।

क्या कनाडा खालिस्तानी तत्वों पर सख्त कार्रवाई करेगा?

क्या भारत कनाडाई नागरिकों के लिए वीजा सेवाओं और कूटनीतिक उपस्थिति को पूरी तरह सामान्य करेगा? इन सवालों के जवाब इस बहुप्रतीक्षित दौरे के बाद ही मिलेंगे।