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April 05 2026 02:25 am

WTO में भिड़े भारत और अमेरिका: नेटफ्लिक्स मूवी और सॉफ्टवेयर पर लगेगा टैक्स? ई-कॉमर्स टैरिफ पर छिड़ी 'डिजिटल जंग'

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कैमरून के याउंडे में चल रही विश्व व्यापार संगठन (WTO) की हाई-प्रोफाइल बैठक इस समय एक बड़े कूटनीतिक अखाड़े में तब्दील हो गई है। डिजिटल व्यापार और ई-कॉमर्स टैरिफ को लेकर दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, भारत और अमेरिका, आमने-सामने हैं। विवाद की जड़ वह 30 साल पुराना नियम है, जो डिजिटल ट्रांजेक्शन को 'टैक्स फ्री' रखता है। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में आपको अपनी पसंदीदा फिल्म डाउनलोड करने या सॉफ्टवेयर खरीदने के लिए ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ेगी?

क्या है 'टैक्स फ्री' विवाद और क्यों मचा है घमासान?

पिछले तीन दशकों से वैश्विक स्तर पर एक समझौता लागू है, जिसके तहत डिजिटल माध्यम से भेजी जाने वाली चीजों (जैसे ई-बुक्स, नेटफ्लिक्स मूवी, गेमिंग ऐप्स और सॉफ्टवेयर) पर कोई भी देश कस्टम ड्यूटी नहीं लगाता। यह छूट इसी महीने खत्म हो रही है। अमेरिका, जो अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और एपल जैसी दिग्गज कंपनियों का गढ़ है, चाहता है कि इस टैक्स छूट को 'स्थायी' कर दिया जाए। वहीं, भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस पर 'गंभीर पुनर्विचार' की जरूरत बताई है। भारत का तर्क है कि इस छूट की वजह से विकासशील देशों को करोड़ों रुपये के टैक्स राजस्व का नुकसान हो रहा है।

भारत का 'बीच का रास्ता': स्थायी समाधान पर अड़ा वाशिंगटन

शुक्रवार रात भारतीय राजनयिकों ने एक अहम संकेत देते हुए गतिरोध तोड़ने की कोशिश की है। भारत इस 'मोराटोरियम' (टैक्स पर रोक) को अगले 2 साल के लिए बढ़ाने पर सहमत हो सकता है, लेकिन वह इसे हमेशा के लिए खत्म करने यानी 'स्थायी' बनाने के सख्त खिलाफ है। दूसरी ओर, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने दो टूक कह दिया है कि वाशिंगटन किसी अस्थायी विस्तार में नहीं, बल्कि केवल परमानेंट सॉल्यूशन में दिलचस्पी रखता है। अमेरिका के लिए यह फैसला 'सबसे आसान और जरूरी' है, जबकि भारत इसे अपनी संप्रभुता और राजस्व से जोड़कर देख रहा है।

टेक कंपनियों में खौफ, निवेश पर मंडराया अनिश्चितता का साया

दुनिया भर की दिग्गज टेक कंपनियों को डर है कि अगर यह समझौता खत्म हुआ और देशों ने डिजिटल उत्पादों पर टैक्स लगाना शुरू किया, तो व्यापार करना बेहद जटिल हो जाएगा। माइक्रोसॉफ्ट के डायरेक्टर जॉन बेसेक के मुताबिक, डिजिटल इकोनॉमी में अनिश्चितता का मतलब है निवेश में कमी। बिजनेस लीडर्स का मानना है कि डिजिटल ट्रेड पर ड्यूटी लगने से न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध के कारण तनाव झेल रही ग्लोबल सप्लाई चेन पर भी बुरा असर पड़ेगा।

WTO की साख दांव पर: क्या निकलेगा समाधान?

याउंडे की यह बैठक अब WTO के अस्तित्व की परीक्षा बन गई है। जहां अफ्रीकी और कैरेबियाई देश 2 साल के विस्तार का सुझाव दे रहे हैं, वहीं कुछ देश 5 से 10 साल का बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुटे हैं। नॉर्वे के विदेश मंत्री का कहना है कि इस मोराटोरियम को आगे बढ़ाना WTO की साख बचाने के लिए अनिवार्य है। अगर यहां कोई ठोस फैसला नहीं होता, तो वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है।