प्रियंका गांधी की मौजूदगी में असम का रण, पर कांग्रेस टिकट के लिए 50,000 की शर्त ने उड़ाए कार्यकर्ताओं के होश

Post

News India Live, Digital Desk: असम में चुनावी बिगुल अभी ठीक से बजा भी नहीं है कि राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हर नेता का सपना होता है कि उसे अपनी पार्टी से टिकट मिले और वह जनता के बीच जाए। लेकिन असम में कांग्रेस की टिकट चाहने वालों के लिए राह इस बार थोड़ी खर्चीली होने वाली है। ताजा खबर यह है कि असम चुनाव के लिए आवेदन करने वाले हर उम्मीदवार को अपनी जेब से ₹50,000 का 'हल्का सा' भुगतान करना होगा।

क्या है कांग्रेस का यह '50 हज़ारी' प्लान?
राजनीति में टिकट की स्क्रीनिंग की प्रक्रिया वैसे भी काफी मुश्किल होती है, लेकिन असम कांग्रेस ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। पार्टी का कहना है कि जो लोग चुनावी टिकट की रेस में शामिल होना चाहते हैं, उन्हें ₹50,000 की रकम बतौर आवेदन शुल्क या डोनेशन जमा करनी होगी। हालांकि पार्टी के भीतर इस फैसले को संगठन की मजबूती और फंड इकट्ठा करने के एक तरीके के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन ग्राउंड पर कार्यकर्ताओं के बीच इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है।

प्रियंका गांधी की पैनी नजर
हैरानी की बात यह नहीं है कि पैसे मांगे जा रहे हैं, बल्कि चर्चा इस बात की है कि इस पूरी प्रक्रिया और स्क्रीनिंग कमेटी पर प्रियंका गांधी खुद नजर रख रही हैं। उनकी मौजूदगी का साफ मतलब है कि पार्टी इस बार 'हल्के' उम्मीदवारों को जगह देने के मूड में नहीं है। प्रियंका गांधी और स्क्रीनिंग कमेटी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि मैदान में वही उतरे जो न सिर्फ आर्थिक रूप से पार्टी का साथ दे सके, बल्कि जीत की क्षमता भी रखता हो।

कार्यकर्ताओं का क्या कहना है?
एक आम कार्यकर्ता के लिए 50,000 की रकम छोटी नहीं होती। ऐसे में यह सवाल उठना वाजिब है कि क्या चुनाव लड़ना अब सिर्फ पैसे वालों का काम रह गया है? पार्टी के समर्थकों का एक तबका मान रहा है कि इससे सीरियस उम्मीदवार ही आगे आएंगे और बेमतलब की भीड़ कम होगी। वहीं कुछ पुराने वफादार थोड़े मायूस भी हैं कि शायद उनके संघर्ष की कीमत अब रुपयों में तौलिए जाने लगी है।

राजनीतिक गुणा-भाग
असम की राजनीति इस समय बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए कांग्रेस फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। प्रियंका गांधी का सीधे दखल देना यह संकेत देता है कि कांग्रेस असम को हल्के में नहीं ले रही है। पैसे इकट्ठा करना एक प्रशासनिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन असली चुनौती जनता का विश्वास जीतना होगी।

अब देखना यह है कि 15 जनवरी की डेडलाइन और 50 हज़ार की ये शर्त कांग्रेस को कितने 'मजबूत' सिपाही दिलवाती है। चुनावी मैदान में सिर्फ नोट नहीं, वोट का महत्व ज्यादा होता है, और उसी की असली लड़ाई शुरू होने वाली है।